राष्ट्रीय कृषि नीति एंव कान्ट्रेक्ट खेती- डा. बद्री विशाल त्रिपाठी

कान्ट्रैक्ट खेती क्या है ?
भारत सरकार ने कृषि विकास हेतु व्यापक परिप्रेक्ष्य में सन् 2000 में राष्ट्रीय कृषि नीति घोषित की। राष्ट्रीय कृषि नीति में कान्ट्रेक्ट खेती का भी प्रावधान किया गया है। यह उल्लेख किया गया है कि कृषि क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को कान्ट्रेक्ट खेती और पट्टे पर भूमि देने की व्यवस्था द्वारा प्रोत्साहित किया जायेगा। कान्ट्रेक्ट खेती को प्रसंस्करण एवं विपणन फर्मों तथा कृषकों के मध्य समझौते के रूप में पारिभाषित किया जा सकता है। कान्ट्रेक्ट खेती के अनुसार कृषक अपनी जोत पर कान्ट्रेक्ट करने वाली कम्पनी द्वारा बताई गई फसल बोयेगा तथा कान्ट्रेक्ट करने वाली फर्म द्वारा बीज, खाद उर्वरक एवं तकनीक की आपूर्ति की जायेगी। कृषक की सम्पूण उपज ठेकेदार कम्पनी द्वारा खरीद ली जायेगी। इससे प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और पूंजी का अंतर्प्रवाह बढ़ेगा तथा तिलहन, कपास और फल की फसलों के लिये सम्यक बाजार उपलब्ध हो सकेगा। ऐसा दावा कृषि नीति में किया गया है। इस प्रकार यह कृषकों और कम्पनियों के बीच अग्रिम करार के अंतर्गत कृषि अथवा बागवानी उपजों के उत्पादन तथा आपूर्ति की एक व्यवस्था है। इस व्यवस्था की विशेषता यह है कि इसमें कृषक निश्चित प्रकार की कृषि-उपज पूर्वत: निश्चित कीमत और समय पर पैदा करने के लिए वचनबध्द होता है। पूर्वत: निर्धारित कीमत, फसल की गुणवत्ताा और मात्रा/एकड़ तथा समय कान्ट्रेक्ट खेती के प्रमुख तत्व होते हैं। कंपनियों, कृषकों एवं फसलों के विभिन्न प्रकार कान्ट्रेक्ट की पृथक-पृथक शर्तें तथा विभिन्न क्षेत्रों की सामाजिक दशा में अंतर के कारण कान्ट्रेक्ट खेती के स्वरूप में भी स्थान-स्थान पर अंतर पाया जाता है। अत: कान्ट्रेक्ट खेती के स्वरूप का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है। उसका स्वरूप विभिन्न घटकों की क्रियाशीलता के कारण परिस्थिति सापेक्ष होता है। परन्तु कुछ अंतर्निहित तत्व सभी स्थानों पर पाये जाते हैं।

इस प्रक्रिया में कृषकों और पट्टेदार के बीच कृषि जोत को लेकर कान्ट्रेक्ट होगा। कान्ट्रेक्ट अवधि के लिये जोत लगान पर या पट्टे पर कम्पनियों को दी जा सकती है। कान्ट्रेक्ट के अनुसार कृषक को अपनी भूमि पर कान्ट्रेक्ट करने वाली फर्म की फसल उगाना पड़ता है। कान्ट्रेक्ट भूमि की उपज कृषक पूर्व निर्धारित कीमत पर कान्ट्रेक्टर को देता है। कान्ट्रेक्टर व्यक्ति या फर्म कृषक को प्राविधिक जानकारी सहित अन्य सभी आगतें उपलब्ध कराता है। कृषक अपनी भूमि और श्रम देता है। भूमि पर उगायी जाने वाली फसलों की प्रकृति, प्रयुक्त तकनीक तथा खेती में होने वाले बदलावों के अनुसार कान्ट्रेक्ट की शर्ते व प्रकृति बदलती है। यह तर्क दिया जाता है कि कृषकों को बहुधा लाभदायक कीमतें नहीं मिल पाती है और कभी-कभी उन्हें अत्यन्त नीची कीमतों पर अपना उत्पाद बेचना पड़ जाता है। दूसरी ओर कृषि आधारित उद्योगों को पर्याप्त मात्रा में गुणवत्ताा युक्त कृषि उत्पाद नहीं मिल पाता है। कृषि परिदृश्य का यह विरोधाभास कान्ट्रेक्ट कृषि की अवधारणा को बल देता है। इससे खेत बाजार में सम्यक सह सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। बड़े कृषि फार्मों पर पूंजी प्रधान उन्नत कृषि विधियों, उन्नत कृषि उपकरणें और आगतों के प्रयोग से उचित मूल्य वाली फसलों का उत्पादन और पौध संरक्षण विधियों का प्रयोग होने से उत्पादन बढ़ेगा। खेती का निगमीकरण हो जायेगा खेती सम्बन्धी सभी निर्णय तथा फसलों के चयन कृषि के तौर-तरीके, प्रौद्योगिकी के प्रयोग और कृषि निवेश सम्बन्धी निर्णय तथा बाजार सम्बन्धी निर्णय बड़ी कृषि कम्पनियों द्वारा लिये जायेंगे।

बड़ी कम्पनियों की विशेष दिलचस्पी कुछ उदाहरण
कृषि नीति, के विविध प्रावधानों में से कान्ट्रेक्ट खेती से सम्बन्धित प्रावधान के प्रति बड़ी कम्पनियों में अत्यधिक उत्साह है। कम्पनियाँ कान्ट्रेक्ट खेती की ओर अग्रसर हैं। पेप्सी कम्पनी इस दिशा में पहले से ही अग्रसर है। पेप्सी फूड्स लि. कम्पनी से जुड़ी पेप्सी कोला नामक कम्पनी ने 1989 में पंजाब के होशियारपुर जिले के जाहरा गांव में 20 करोड़ रुपये की लागत से टमाटर का प्रसंस्करण करने का संयंत्र लगाया और पंजाब में कान्ट्रेक्ट खेती आरम्भ की। कम्पनी ने इससे उत्साहित होकर पंजाब के जालंधर, अमृतसर, होशियारपुर और संगरूर जिलों तथा पश्चिमी उत्तार प्रदेश के कुछ भाग में बासमती चावल, आलू और मूंगफली की खेती भी आरंभ की। अपाची काटन कम्पनी ने वर्ष 2002 में तमिलनाडु के कोयम्बटूर जिले के कि नाथकडाऊ विकास खंड में कृषकों को कपास बोने के लिये सहमत किया। उत्तारी कर्नाटक में कृषक गन्ना की फसल पर केन्द्रित थे। गन्ने की बार-बार सिंचाई होने के कारण भूमि क्षारीय हो रही थी। इसका लाभ उठाकर न्यूगार शुगर वक्र्स लिमिटेड ने कृषकों को जौ की खेती के लिये प्रोत्साहित किया। उसे अपनी कम्पनी के लिये जौ की आवश्यकता थी। इससे कम्पनी को आस-पास जौ मिलने लगा तथा उत्तार भारत से जौ मंगाने पर लगने वाली अधिक यातायात लागत बच गयी। मध्य प्रदेश में हिन्दुस्तान लीवर, रल्लीज और आई.सी.आई.सी.आई द्वारा सम्मिलित रूप से गेहूँ की खेती कराई जा रही है। इस व्यवस्था में रल्लीज कृषि और प्राविधिक सलाह और आई.सी.आई.सी.आई कृषि साख उपलब्ध करता है। हिन्दुस्तान लीवर उनकी उपज खरीदती है। इससे कृषकों को सुनिश्चित बाजार, हिन्दुस्तार लीवर को गुणवत्ता युक्त उत्पादन तथा रल्लीज एवं आई.सी.आई.सी.आई को सुनिश्चित ग्राहक मिल जाते हैं। पंजाब, हरियाणा, उत्तार प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गुजरात में कई स्थानों पर संविदा कृषि होने लगी है। दक्षिण भारत में कई स्थानों पर मसाले के उत्पादन हेतु कान्ट्रेक्ट खेती की जा रही है। रिलायंस कम्पनी कान्ट्रेक्ट फार्मिंग के आधार पर अनाज फल, मसाले, सब्जियां आदि की खेती के लिये हरियाणा में अग्रसर है। पश्चिम बंगाल और असम में चाय की कान्ट्रेक्ट खेती आरंभ की है।

कांट्रेक्ट खेती का विज्ञापन
कान्ट्रेक्ट खेती वस्तुत: बहुराष्ट्रीय निगमों की कृषि प्रणाली के समान है। इसमें भूमि का नाम मात्र का स्वामित्व कृषकों के पास रहेगा। निर्णय का असली अधिकार कम्पनी के पास हो जायेगा। कृषि कार्य आधुनिक कृषि यंत्रों की सहायता से किराये के श्रमिकों द्वारा किया जायेगा। अधिकांश उत्पादन बाजार के लिए होता है, विशेष रूप से व्यापारिक फसलों का उत्पादन किया जाता है। उपज को बाजार एवं उपभोग योग्य बनाने के लिए प्रसंस्करण्ा इकाइयाँ होती हैं। अत: इन निगमों का कृषि फार्म एक कृषि और औद्योगिक संस्थान होता है। उपयुक्त मशीनें और अन्य उत्पादन के साधन प्राप्त हो जाते हैं। फलत: कृषि परम्परावादी नहीं रह जाती है। एक स्थान पर मुख्य रूप से एक विशेष फसल का उत्पादन होता है जिससे उस फसल के गुण और मात्रा में वृध्दि हो जाती है और बड़े पैमाने की कृषि के समस्त लाभ प्राप्त हो जाते हैं। कृषि विकास एवं नवीनीकरण की सम्भावना बनी रहती है और भूमि का अधिकतम दोहन होता है। कृषि में उन्नत तरीकों को प्रोत्साहन मिलता है। बाजार में विस्तार, उद्योगों के विस्तार को प्रोत्साहित करेगा तथा यातायात और संचार के साधनों में सुधार होगा। कृषि कार्य अब अधिक पूंजी की अपेक्षा करने लगा है। नवीन कृषि निवेशों के लिये अधिक पूंजी की आवश्यकता होने लगी है। अत: कम्पनियों की कृषि प्रणाली उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिये उपयोगी है। परन्तु वास्तविक एवं व्यापक परिप्रेक्ष्य में कान्ट्रेक्ट खेती में गंभीर विसंगतियां हैं जिनके कारण इसे कृषि प्रणाली के रूप में अंगीकृत नहीं किया जा सकता है।

कान्ट्रेक्ट खेती से खेती और किसानों को हानियाँ
इस प्रणाली में कृषि उत्पादन मुख्यत: व्यापारिक फसलों का होगा। फसल प्रारूप एवं फसल संरचना में अभी ही व्यपारिक फसलों के अंतर्गत क्षेत्र बढ़ने लगा है, यह प्रवृत्तिा बढ़ेगी। भारत में खाद्य पदार्थों की अत्यधिक आवश्यता बनी रहती है। यदि देश की अधिकांश भूमि पर व्यापारिक फसलों का ही उत्पादन होगा तो हमारी खाद्य समस्या अधिक जटिल हो जायेगी और अनाज के लिये पुन: हमें विदेशों पर निर्भर रहना पड़ेगा। कान्ट्रेक्ट खेती में भूमि के स्वामी कृषक को कृषि क्षेत्र पर कार्य के बदले मात्र कीमत मिलती है। युनाइटेड प्राविन्सेज की जमींदारी उन्मूलन समिति में भी इस प्रणाली की इन्हीं आधारों पर अनुपयुक्तता बताई गई थी। वह पध्दति जो किसानों को उनके वास्तविक अधिकारों से वंचित कर देती है, उन्हें औद्योगिक श्रमिक की स्थिति में घटा कर ला देती है और उन्हें पूँजीवादी शोषण का विषय बना देती है, वह विचार योग्य नहीं। कान्ट्रेक्ट खेती का लक्ष्य उत्पादन एवं लाभ को अधिकतम करना होता है। वह भूमि की उर्वरा शक्ति का अधिकतम शोषण करता है जिससे भूमि के स्वाभाविक गुण धर्म में ह्वास होता है। वर्तमान कृषि प्रणाली का यह भी दायित्व है कि आगामी पीढ़ी के लिये समुन्नत भूमि संसाधन हस्तांतरित करे जो भूमि संसाधन के अतिशोषण के कारण सम्भव न हो सकेगा।

ऍंग्रेजी शासन का कटु अनुभव
अंग्रेजों के शासनकाल में कम्पनियों द्वारा कृषि चाय बागानों, कहवा और रबर बागानों तथा नील की खेती के रूप में आरंभ हुई। चाय बागानों के मजदूरों की खराब दशा पश्चिम बंगाल और असम में देखी जा सकती है। नील की खेती के लिये अंग्रेजों ने 'तिनकठिया व्यवस्था' लागू की थी जिसके अनुसार प्रत्येक कृषक को अपनी भूमि के 3/20 भाग पर नील की खेती अवश्य करनी था। अत्याचार के भय से कृषक इससे अधिक भाग पर ही नील की खेती करते थें नील की खेती करने वालों की दुर्दशा और निलहों की कार्यशैली पर व्यंग करते हुये 1860 में दीनबन्धु मित्रा ने 'नील दर्पण' नामक नाटक लिखा था। महात्मा गांधी ने दक्षिणी अफ्रीका से लौटने के बाद चम्पारन जिले में नील के काश्तकारों और मजदूरों के शोषण के खिलाफ आवाज उठायी और वहीं से देश के स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित हुये। कम्पनी कृषि के अनुभव अत्यन्त खराब रहे हैं।
यदा कदा यह पाया गया है कि कान्ट्रेक्ट खेती से कृषकों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया, उन्हें स्थायी आय के स्रोत प्राप्त हुये। रोजगार के अधिक अवसर सृजित हुये तथा कृषकों को कृषि की नवीन एवं अधिक कुशल तकनीक ज्ञात हुयी। परन्तु सामान्य रूप से कान्ट्रेक्ट खेती के परिणाम हानिकारक रहे हैं। यह पाया गया है कि कान्ट्रेक्ट की शर्तें पक्षपात पूर्ण एवं बहुधा कृषक विरोधी होती हैं और उन्हें कड़ाई के साथ लागू किया जाता है। कम्पनियां कृषि उपज की नीची और अपनी सेवाओं की ऊँची कीमतें निर्धारित करती हैं। उपज की कीमत भुगतान करने में विलंब करती हैं। प्राकृतिक आपदा, प्रतिकूल मौसम एवं अन्य कारणों से कृषि में नुकसान की कम्पनियां क्षतिपूर्ति नहीं करती है। भू-गर्भ जल का अतिदोहन, मिट्टी में क्षारीयता बढ़ना, भूमि की उर्वरता में ह्वास, पारिस्थितिक ह्वास एवं संसाधनों का बर्बर दोहन कान्ट्रेक्ट खेती प्रणाली की सामान्य बात है। कान्ट्रेक्टेड भूमि की उर्वरता कम हो जाने और क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो जाने के बाद कान्ट्रेक्टर फर्में नये क्षेत्रों में कान्ट्रेक्ट करती हैं। कृषकों की सौदा करने की शक्ति कम होती है। अत: कान्ट्रेक्ट खेती में अधिक लाभ फर्मों को प्राप्त होता है। कृषि साख एवं अन्य कृषि आगतों की प्राप्ति के लिये कृषक पराश्रित हो जाते हैं। कृषक एवं कान्ट्रेक्ट फर्मों में आरंभ में सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण होते हैं परन्तु कुछ समय बाद ही उनमें कटुता उत्पन्न हो जाती हैं।

बड़ी कंपनियों में जमीन पर कब्जा करने की होड़
वस्तुत: निगमीय कृषि करने वाली कम्पनियाँ राष्ट्रीय कृषि नीति के शब्दों का पालन कर रही हैं, उसकी भावना का नहीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जनआकांक्षाओं, आंदोलनों और कार्यक्रमों को ध्यान में रख कर आर्थिक न्याय की दृष्टि से जमींदारी उन्मूलन एवं जोत सीमाबन्दी के कानून विभिन्न राज्यों मे पारित किये गये। आज उन कानूनों को राज्य सरकारों द्वारा बदला जा रहा हैं। दसवीं पंचवर्षीय योजना की रिर्पोट में कहा गया है कि हाल की अवधि में राज्य सरकारों ने भूमि कानूनों को उदार बनाने की पहल की है ताकि निगमीय कृषि को बढ़ावा दिया जा सके। भूमि पर पूंजीपतियों का स्वामित्व क्रमश: बढ़ रहा है। छोटे किसानों की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है। अब तो व्यावसायिक प्रतिष्ठान बनाने और उपनगर बनाने के लिये औद्योगिक घराने लाखों एकड़ भूमि खरीद रहे हैं। उनकी भूमि-क्षुधा अत्यन्त तेजी से बढ़ रही है। विकास के नाम पर खेती वाली जमीन गैर-कृषि प्रयोग में हस्तांतरित हो रही है। भूमि बैंक बन रहे हैं। कृषि क्षेत्र में पिछले दस वर्षों से गतिहीनता की दशा बनी है। कम्पनियां भूमि ग्रहण के प्रति अत्यन्त जल्दी में हैं। उनमें परस्पर प्रतिद्वन्दिता बढ़ रही है। भूमि को लेकर अतीत में समाज में कलह और राष्ट्रों में युध्द होते थे। भूमि आज भी विवादों का एक प्रमुख कारण है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) और विशेष कृषि आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना की घोषणा के बाद इस प्रवृति को अधिक बल मिला है। विशेष आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना, अवासीय परिसरों के निर्माण, कृषि फार्मों की स्थापना, भूमि बैंकों की स्थापना, आवासीय परिसरों के निर्माण, कृषि फार्मों की स्थापना, भूमि बैंकों की स्थापना, सड़क निर्माण आदि के लिये व्यावसायिक घराने एवं कम्पनियाँ लाखों एकड़ भूमि खरीदने को आतुर हैं। रिलायंस इन्डस्ट्रीज, टाटा समूह, बाबा कलयानी, सहारा, महिन्द्रा ग्रुप, अंसल, इन्फोसिस, इंडिया बुल्स आदि नगरों में या उसके निकट बड़े-बड़े भू-भाग खरीदने को आतुर हैं। टाटा समूह ने भारत में कहीं भी 3 एकड़ से 2500 एकड़ तक भूमि निजी स्वामियों से खरीदने का विज्ञापन दिया है। कान्ट्रेक्ट खेती तात्कालिक आधार पर लाभदायक प्रतीत हो सकती है, उत्पादन वृध्दि कर सकती है, परन्तु सतत विकास की दृष्टि से यह प्रणाली उपयोगी नही है। पट्टे पर जमीन देना स्वतंत्रता से पूर्व कृषि प्रणाली का अंतर्निहित अंग रहा है। इस व्यवस्था में जमींदार पट्टे पर स्वामित्व विहीन कृषकों को जमीन देते थे जिसमें निष्ठुर लगान व्यवस्था सामान्य थी। भूमि व्यवस्था का यह अत्यन्त विवादास्पद स्वरूप था। अब प्रतिवर्ती पट्टे की दशायें उत्पन्न हो रही है। अब पट्टे पर काश्तकार जमीन दे रहे हैं जो अन्तत: कृषक और कृषि दोनों के लिए हानिकारक हैं।

ठेका खेती के बड़े ठेकेदार -डा. देवेन्द्र प्रसाद पाण्डेय

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने कैबिनेट की मंजूरी के बाद प्रदेश की नई कृषि एवं अवस्थापना निवेश नीति लागू करने की घोषणा की। इस नीति के तहत निजी कम्पनियों और किसानों के लिए अनुबंध खेती (कांट्रैक्ट फार्मिंग) का विकल्प खोल दिया गया है जिसके तहत कम्पनियाँ सीधे किसानों को बीज, खाद और कर्ज सुविधा उपलब्ध कराकर उनके द्वारा उत्पादित गेहूँ, चावल, दाल, फल, फूल, सब्जी इत्यादि खरीद सकेंगी और रिटेल बाजार में बेच सकेंगी। बड़े निवेशकों को मंडी स्थल के बाहर खरीदने-बेचने की सुविधा होगी। सरकार इसके लिए लाइसेंस जारी करेगी तथा एकल लाइसेंस की व्यवस्था की गयी है। इसके लिए मण्डी परिषद एक्ट, 1964 में संशोधन किया गया है। न्यूनतम रु. 500 करोड़ वाले निवेशक इच्छा अभिव्यक्ति पत्र प्रस्तुत करेगें तथा उन्हें 3 वर्ष में कृषि व्यवसाय एवं सम्बंधित क्षेत्र में 5,000 करोड़ रुपये का निवेश करना होगा। (किसानों और जनसंगठनों के विरोध के कारण मायावती ने यह नीति 23 अगस्त को वापिस ले ली है।)

अनुबंध खेती के तहत किसान अपनी कृषि योग्य जमीन पर प्रायोजक कम्पनी के मानदण्डों के अनुसार खेती करता है तथा मानदण्ड पर खरा उतरने पर ही उसके उत्पाद खरीदे जा सकते हैं। अभी तक कृषि व्यवसाय के खुदरा व्यापार में आईटीसी अपने ई-चौपाल, महिन्द्रा अपने शुभ-लाभ, गोदरेज एग्रोवेट अपने 'आधार', टाटा अपने टाटा किसान संसार, रिलायंस अपने रिलायंस फ्रेश, भारती इण्टर प्राइजेज अपने फील्ड फ्रेश के नाम से कृषि व्यवसाय में स्थापित हैं। कृषि व्यवसाय पर कब्जा जमाने की वास्तविकता का आभास इसी से होता है कि रिलायंस ने 784 कस्बों, 6000 मण्डियों तथा 1,600 ग्रामीण व्यवसाय में अपनी सेवायें देने की योजना बनायी है तथा इसके लिए रु. 50,000 करोड़ के निवेश की योजना है। (बिजनेसवर्ल्ड, 9 जुलाई 2007)

1990 के दशक में संचार क्रांति करने वाले सुनील मित्ताल ने खुदरा क्षेत्र की कम्पनी 'वाल-मार्ट' से हाथ मिलाकर कृषि व्यवसाय में पाँव पसारना शुरू कर दिया है। उनका समूह रॉथशील्ड समूह के साथ मिलकर एलरो होल्डिंग इंण्डिया नाम की कम्पनी बनाकर 'फील्ड फ्रेश' ब्रांड से अपने कृषि उत्पाद का निर्यात कर रहा है। क्रिसिल शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि खुदरा क्षेत्र में खाद्य एवं ग्रासरी सामग्री का हिस्सा कुल बिक्री का 74 प्रतिशत है जो लगभग 1280000 करोड़ रु. है जिसमें वर्तमान में मात्र 18 प्रतिशत संगठित खुदरा व्यापार के हिस्से में है। जाहिर है इन कम्पनियों के लिए यह बाजार अवसर भरा है। प्रमुख शीतल पेय कम्पनी पेप्सिको होंल्डिंग ने अनुबंध खेती की शुरुआत पंजाब में की थी जिसके माध्यम से वहाँ टमाटर, मिर्च, मूँगफली इत्यादि की वाणिज्यिक खेती की गयी। अब पूरे देश में उत्पादक क्षेत्रों को चयनित करके अनुबंध खेती करके खुदरा कृषि व्यापार पर कब्जा जमाने की तैयारी चल रही है।

आईटीसी के अध्यक्ष वाई.सी. देवेश्वर ने 27 जुलाई 2007 को वार्षिक आम सभा में उपस्थित शेयर धारकों को सम्बोधित करते हुए बताया कि कम्पनी द्वारा वर्तमान में 6400 ई-चौपाल संचालित है जो 38500 गाँवों तथा 9 राज्यों में फैले हैं।

आईटीसी ने सब्जी एवं फल व्यवसाय में पैर जमाने की तैयारी कर ली है। 'टाटा किसान संसार' के माध्यम से टाटा समूह किसानों को तकनीकी जानकारी, बीज, खाद, रसायन इत्यादि प्रदान कर रहा है। अभी तक कम्पनी ने तीन राज्यों में 14000 केन्द्र स्थापित किये हैं। कम्पनी इन्हीं केन्द्रों के माध्यम से 15000 हेक्टेयर जमीन पर अनुबंध खेती भी करा रही है जिसमें उ.प्र. और, महाराष्ट्र एवं कर्नाटक में फूल तथा पंजाब में सब्जी की खेती की जा रही है।

ग्रामीण बाजार पर अपने उत्पादों से पकड़ बनाने वाली कम्पनी गोदरेज ने अपनी कम्पनी 'गोदरेज एग्रोवेट' के माध्यम से 70 'आधार' एवं 'मंथन' केन्द्र खोल रखे हैं। कृषि के लिए आवश्यक सामग्री जैसे बीज, खाद बेचने के साथ-साथ ये केन्द्र मिट्टी परीक्षण, पशु स्वास्थ्य सबंधी सलाह इत्यादि सेवायें देगें। इस वर्ष कम्पनी कुल 2500 गाँवों में अपना प्रसार करके कृषि उत्पाद को खरीद कर अपनी खुदरा श्रृखंला 'नेचर्स बास्केट' के माध्यम से महानगरीय उपभोक्ताओं को संतुष्ट करेगी।

महाराष्ट्र के रत्नागिरी क्षेत्र में पैंटेलून लि. ने किसानों की सहकारी समिति बनाकर सीधे कृषि उत्पाद जैसे आम की खरीद शुरू की है। पिछले वर्ष किशोर बियानी की इस कम्पनी ने 35000 टन आम खरीदे। पैंटेलून का खाद्य उत्पाद व्यवसाय 25 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रहा है। (बिजनेस वर्ल्ड 9 जुलाई 2005)

रिलायंस ने जामनगर स्थित पेट्रोकेमिकल परिसर में आम की खेती कर उसका निर्यात किया तथा नवसारी के पास किसानों के साथ मिलकर कम्पनी ने आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों तथा अश्वगंधा तथा सौंदर्य प्रसाधन में काम आने वाली औषधियों की खेती शुरू की है। इसके लिए कम्पनी ने 225 करोड़ रुपए खर्च किये हैं (संगवई, संजय: किसानो के नये कम्पनी बहादुर, सामयिक वार्ता, फरवरी-मार्च, 2005)

हाल ही में पंजाब तथा हरियाणा में शिमला मिर्च 3-5 रु. किलो बिकी। कारण था कि बड़ी कम्पनियों ने किसानों से उनके उत्पाद नहीं लिये जिसके कारण उनको कम दाम पर बाजार में उत्पाद देना पड़ा। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में गन्ने की अच्छी पैदावार हुई, पर किसानों को उचित मूल्य नहीं मिला या उनकी फसल खरीद न होने कारण सूख गयी।

वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने बजट 2007-08 में कृषि हेतु कई वित्तीय पैकेज की घोषणा की जिनमें कृषि ऋण हेतु रु. 2,25,000 करोड़ की व्यवस्था तथा 50,00,000 नये किसानों की ऋण सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा। बजट में उन्होनें ऋणग्रस्तता के अध्ययन हेतु डा. आर. राधाकृष्ण समिति का गठन, दलहन के लिए मिशन, सूखा क्षेत्र विकास कार्यक्रम के लिए 100 करोड़ रुपये, भूमिगत जल प्रबंधन हेतु 1800 करोड़ रुपये तथा आल्मा को 300 जिलों में आच्छादित करने हेतु 230 करोड़ रुपये; कृषि बीमा के लिए 500 करोड़ रुपये एवं अन्य मदो हेतु वित्तीय प्रावधान किये।

इसी सरकारी पैकेज को हड़पने के लिए बड़ी कम्पनियाँ किसानों को बीज, खाद, सप्लाई एवं वैज्ञानिक सलाह तक अपने को सिमित कर रही हैं क्योकि असली मुनाफा यहीं मिलेगा। जबकि सिंचाई, भूमि का समतलीकरण, आधारभूत संरचना या तो राज्य करे या फिर किसान। वित्त मंत्री द्वारा प्रावधानित राशि को कैसे खींचा जाय, इसके के लिए इन कम्पनियों में होड़ लगी है।

नेपाल में गणतंत्र की राह में कांटे बो रहा है ए.डी.बी.

एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) किस प्रकार किसी देश की राजनीति को प्रभावित करता है इसका उदाहरण है नेपाल की यह घटना नेपाल की मेलाम्ची परियोजना महत्वपूर्ण परियोजना है। काठमांडो उपत्यका को पेयजल की आपूर्ति करने वाली यह परियोजना अत्यंत महत्तवपूर्ण है जो (एडीबी) से प्राप्त आर्थिक सहायता से चलती है। यह विभाग नेकपा (माओवादी) की केंद्रीय समिति की सदस्य हिसिला यामी के मंत्रालय के अधीन है। परियोजना का कांट्रैक्ट जून में समाप्त हो रहा था।
एडीबी ने इस परियोजना के लिए 55 करोड़ की राशि देने के साथ यह शर्त लगा दी कि नया कांट्रैक्ट उसके द्वारा नामजद ब्रिटिश कंपनी सेवर्न ट्रेंट को ही दिया जाए। हिसिला यामी ने देखा कि जिस कंपनी को ठेका देने की बात की जा रही है उसके खिलाफ कुछ देशों में धोखाधड़ी के मामले हैं और ऐसी कंपनी को इतना महत्तवपूर्ण ठेका देना राष्ट्रीय हित में नहीं है। मंत्री ने यह प्रस्ताव रखा कि 'पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप' के आधार पर एक नई कमेटी का गठन किया जाए और उसे यह ठेका दिया जाए। इस प्रस्ताव ने तूफान खड़ा कर दिया। कोइराला के वरिष्ठ सहयोगी और वित्तामंत्री रामशरण महत ने हिसिला यामी के खिलाफ मुहिम छेड़ दी।
दूसरी तरफ एडीबी के सर्वोच्च आधिकारियों की लगातार बैठकें चलने लगीं और देशी-विदेशी स्रोतों से हिसिला पर दबाव पड़ने लगा कि यह ठेका इस बदनाम कंपनी को ही दिया जाए जिसका नाम एडीबी ने प्रस्तावित किया है और जिसके पक्ष में रामशरण महत खुल कर बोल रहे हैं। अंत में एडीबी ने कह दिया कि अगर सेवर्न ट्रेंट को ठेका नहीं दिया गया तो वह पैसे नहीं देगा, हिसिला इस धमकी के आगे झुकी नहीं।
उनका कहना था कि एक संप्रभु राष्ट्र होने के नाते हमारा यह अधिकार है कि हम राष्ट्र हित को देखते हुए अपने अनुसार उस पैसे का उपयोग करें। एक भ्रष्ट कंपनी के पक्ष में नेपाली कांग्रेस के लोगों के लामबंद होने से जनता में एक बहस की शुरुआत हुई जो अभी जारी है। वैसे, एडीबी अब पैसे देने को तैयार हो गया है।

'वर्दी में और उसी असेंबली से चुनाव लड़ना' ही मुशर्रफ की प्राथमिकता : सफदर बलोच/इस्लामाबाद/ समकाल हिन्दी पाक्षिक

जनरल परवेज मुशर्रफ के समर्थक चंपुओं ने पिछले आठ साल से राजनीति और राजनीतिज्ञों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ रखी है। इस मुहिम का मुख्य संदेश यही है कि जनप्रतिनिधि पूरी तरह से भ्रष्ट तो हैं ही अक्षम भी हैं और इसी आधार पर यह तर्क दिया जा रहा है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था तभी बच सकती है जब देश में लोकतंत्र कायम होने से रोका जाए, क्योंकि लोकतंत्र चरित्र से ही 'विनाशक' है। बजाए इसके तानाशाही ही ठीक है।

उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक बेनजीर और मुशर्रफ द्विपक्षीय समझौते का मतलब है कि जनरल मुशर्रफ को आने वाले पांच साल के लिए फिर से राष्ट्रपति चुना जाएगा और भुट्टो को कुछ रियायतें दी जाएंगी। इन रियायतों में भुट्टो के खिलाफ लगाए गए भ्रष्ट्राचार के सभी आरोपों को वापस लिया जाएगा और उन सभी मुकद्मों को भी जल्द ही खत्म कर दिया जाएगा। तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने की राह में आने वाली उन सभी बाधाओं को दूर कर दिया जाएगा, जिनके कारण वे आगामी चुनाव के लिए अयोग्य घोषित की गईं थीं। जैसा कि उन पर पब्लिक आफिसिस आर्डर 2002 के तहत प्रतिबंध लगाया गया था। मुशर्रफ ने उस समय यह आदेश इसलिए लागू किया था ताकि 'कोई भी भ्रष्ट राजनेता देश को नुकसान पहुंचाने की कोशिश न करे'।

समझौते के मुताबिक केंद्र में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग के साथ और सिंध में मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट के साथ मिलकर सरकार बनाएगी। पंजाब में योग्यता के आधार पर तय किया जाएगा, यानी चुनाव में मिलने वाले वोट यह तय करेंगे कि सरकार किसकी होगी। एनडब्ल्यूएफपी या तो गठबंधन सरकार के लिए या फिर गठबंधन विपक्ष के लिए दावा रखेगा। यह इस बात पर तय करेगा कि धार्मिक संगठन एमएमए साथ रहेगा या अलग हो जाएगा। बलूचिस्तान में पीपुल्स पार्टी विपक्ष में बैठेगी। सरल शब्दों में कहें तो जनरल मुशर्रफ राष्ट्रपति बनकर देश पर शासन करेंगे और बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री बनकर उनका सहयोग करेंगी। लेकिन समझौते की इन शर्तों को लागू होने पर भी लोग तरह-तरह की आशंकाएं व्यक्त कर रहे हैं।

राष्ट्रपति के सहायक ने बताया कि 'भुट्टो को सभी आरोपों से बरी करने की प्रक्रिया पहले ही शुरू की जा चुकी है और राष्ट्रपति चुनाव के समय तक पूरी हो जाएगी। उन्हें विश्वास दिलाने के लिए तब तक कुछ रियायतें भी दे दी जाएंगीं'। इतना ही नहीं सूत्रों के मुताबिक भुट्टों को भी ऐसा लगता है कि जिस राजनीतिक जीवन का अंत हो गया था, उसे दोबारा जीवित करने का अवसर मिलने वाला है। राष्ट्रपति की टीम के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया कि 'भुट्टो की बातचीत हमेशा व्यक्तिगत स्थिति को उभारने पर ही केंद्रित होती है, वह न केवल अपनी राजनैतिक स्थिति को सम्मानजनक बनाना चाहती हैं, बल्कि राजनीतिक भविष्य को भी सुरक्षित करना चाहती हैं। इसीलिए उनकी बातचीत में यह मुद्दा केंद्र में रहता है।'

लेकिन सच तो यह भी है कि भुट्टो का आंतरिक दायरा अब भी इस बात से आश्वस्त नहीं है कि पार्टी जनरल मुशर्रफ को सैनिक वर्दी के साथ दूसरी बार चुनाव लड़ने के लिए समर्थन देगी। लंदन और इस्लामाबाद घूम चुके एक सूत्र ने इन आंतरिक चिंताओं का खुलासा किया कि 'जनरल मुशर्रफ को समर्थन की वजह से आने वाले खतरों से भुट्टो अनजान नहीं हैं। यह बात कोई मायने नहीं रखती कि इससे उसे और उसकी पार्टी को कितना लाभ होगा, इससे उनकी पार्टी की प्रतिष्ठा भी खत्म हो सकती है।' यह सब चिंताएं निराधार नहीं हैं, क्योंकि जनरल मुशर्रफ और उनके सत्तारूढ़ दल को लोकप्रियता हासिल नहीं है। इंटरनेशनल रिपलब्लिकन इंस्टीटयूट द्वारा हाल में किए गए एक अध्ययन के अनुसार मुशर्रफ की लोकप्रियता पिछले वर्ष के 64 फीसदी से गिरकर जून 2007 में मात्र 34 फीसदी रह गई है। हालांकि यह 34 फीसदी भी अविश्वसनीय ही प्रतीत होता है, क्योंकि एक लोकप्रिय आलोचना में इस अध्ययन की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा गया है कि इसमें जमीनी सच्चाई नहीं दिखाई गई है। हालांकि यह आलोचना बहुत तीखी है, लेकिन सबूतों के आधार पर ऐसा कहा गया है। क्योंकि इस अध्ययन में पाकिस्तान के चीफ जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी की वापसी के लिए लोगों की संवेदनाओं का उभार शामिल नहीं हैं। लाल मस्जिद में जिस तरह सैनिक कार्यवाही की गई थी, उसके खिलाफ लोगों का गुस्सा भी इस रिपोर्ट में शामिल नहीं हैं। इन दोनों घटनाओं के कारण जनरल मुशर्रफ की तस्वीर जनता के विभिन्न वर्गों के बीच और बिगड़ी है।

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के एक नेता ने बताया कि उनकी पार्टी के लिए यही अच्छा होगा कि वह मुशर्रफ को सेना की वर्दी के बिना चुनाव में खड़े होने के लिए समर्थन दे। चुनाव के दिन भी अगर वह अपनी वर्दी में रहते हैं तो यह हमारी पार्टी के लिए बड़ी समस्या बन सकती है। हालांकि जनरल मुशर्रफ कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते। वह अपने इस द्विपक्षीय रिश्ते को अगले सत्र के लिए एक गारंटर की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं। राष्ट्रपति सूत्रों के मुताबिक 'वर्दी में और उसी असेंबली से चुनाव लड़ना' ही मुशर्रफ की प्राथमिकता है।
साभार-समकाल हिन्दी पाक्षिक

वर्तमान हालात को देखते हुए लगता है कि शायद ही मुशर्रफ वर्दी छोड़ें। मुशर्रफ वादा तो कर रहे हैं कि वादा निभाउंगा, पर विश्वास कौन करे, अमेरिका मुशर्रफ को राष्ट्रपति देखना चाहता है, जो अब होने जा रहा है। अगर विपक्षी पार्टियां इस्तिफा देती हैं तो शायद एक नया नजारा मिले.................

भारतीय जीवन बीमा क्षेत्र को बेचा जा रहा है - डा. कृष्ण स्वरूप आनन्दी

यद्यपि वर्तमान में घरेलू बीमा सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 26 प्रतिशत है, फिर भी बीमा बहुराष्ट्रीय कम्पनियां तेजी से भारत के बीमा क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं और यहां अपने कारोबार को तेज कर रही हैं। वें भारतीय साझेदारों के साथ तेजी से संयुक्त उपक्रम बना रही हैं। उन्हें उम्मीद है कि निकट भविष्य में बीमा क्षेत्र का और उदारीकरण होगा अर्थात बीमा क्षेत्र में सीधे विदेशी पूंजी निवेश की सीमा पहले 26 प्रतिशत से 49 प्रतिशत तक फिर 49 प्रतिशत से 74 प्रतिशत तक और अंत में 100 प्रतिशत तक बढ़ा दी जायेगी। पिछले 5 वर्षों के दौरान निजी बीमा कम्पनियां, जिनमें विश्व की विशाल बीमा कम्पनियों की भी हिस्सेदारी है, 90 प्रतिशत की दर से विकास कर रही है जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की जीवन बीमा निगम केवल सालाना 40-45 प्रतिशत की विकास दर पर ही अटकी हैं, हांलाकि देश में जीवन बीमा व्यवसाय 100 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है।
विकसित देशों में बीमा व्यवसाय लगभग संतृप्तता की स्थिति में पहुंच गया है, जबकि भारत जैसे विकासमान देश में यह व्यवसाय तेजी से फलने फूलने की स्थिति में है। विकसित देशों में अपने व्यवसाय में छायी मंदी से उबरने के लिये वहां की बीमा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने भारत की ओर रुख किया है क्योकि यहां पर उन्हें असीम सम्भावनाऐं नजर आ रही है। वे यहां आकर भारतीय बैंको और निजी कम्पनियों के साथ उपक्रम स्थापित कर रही है।

विदेशी बीमा कम्पनियां ---भारतीय साझेदार
प्रूडेन्श्यिल फाइनेन्सियल, यू.एस ---- डी.एल.एफ.
एच.एस.बी.सी. यू.के ----- कैनरा बैंक एवं ओ.बी.सी
जैनरेली, इटली -----फ्यूचर ग्रुप
सोम्पो, जापान ----इलाहाबाद बैंक, आइ.ओ.बी. बैंक
दाय इची म्यूचअल, जापान ----बैंक आफ इण्डिया
फोर्टिस, बेल्जियम ---आई.डी.बी.आई. और फेडरल बैंक
प्रिंसिपल, यू.एस. ---- पी.एन.बी. एवं विजया बैंक
एजियोन, नीरदलैण्ड --- रेलीगार, बी.सी.सी.एल.
एर्गो, जर्मनी -----अभी तय नहीं
लीगल एण्ड जनरल, यू.के. ---अभी तय नहीं
मीलिया ऐशिया, जापान ----अभी तय नहीं
सैमसंग, कोरिया -----अभी तय नहीं
नेशनवाइड, यू.एस. ---------अभी तय नहीं
आलस्टेट, यू.एस. --------अभी तय नहीं


जीवन बीमा के क्षेत्र में उदारीकरण के शुरुआती दौर में ही भारत आ चुकी बहुराष्ट्रीय बीमा कम्पनियां अब इस बढ़ते बाजार का लाभ उठा रही हैं। दिनोदिन ये कम्पनियाँ जीवन बीमा में फैल रही है और जीवन बीमा निगम के बाजार हिस्से को कब्जा रही है। इस तरह वे अपनी स्थिति को बढ़ा रही है और मजबूत कर रही है। 2003-04 वित्ताीय वर्ष में बीमा बाजार में उनका हिस्सा 15 प्रतिशत था जो तेजी से बढ़कर 2006-07 में 37 प्रतिशत हो गया। 2006-07 में भारतीय जीवन बीमा निगम की हिस्सेदारी मात्र 63 प्रतिशत रह गयी। उदारीकरण की नीतियों से पहले निगम की हिस्सेदारी 100 प्रतिशत थी। अब यह तेजी से सिकुड़ रहा है और नष्ट हो रहा है।

भारत में अब जीवन बीमा के मालिकाने का अधिकार उलट गया है। यह भारतीय जीवन बीमा से छिन कर विदेशी भीमकाय बीमा कम्पनियों के हाथ में जा रहा है और वे तेजी से इस क्षेत्र का नेतृत्व अपने हाथ में लेती जा रही हैं। भारत की सबसे ज्यादा सक्षम, विशाल और मुनाफा कमाने वाली भारतीय जीवन बीमा निगम को एक तरह से विदेशी भीमकाय बीमा कम्पनियों को सौंपा जा रहा है। अब पहिया उलटी दिशा में घूम रहा है। जनवरी 1956 में सरकार ने देश में काम कर रही 245 देशी विदेशी बीमा कम्पनियों का अधिग्रहण कर लिया था और 1 सितम्बर 1956 को इनका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था। संसद द्वारा पारित एक कानून के तहत 1 सितम्बर 1956 को जीवन बीमा निगम बनाया गया। इसकी स्थापना का उद्देश्य था देश के कमजोर और गरीब तबको को भी सस्ती दरों पर जीवन बीमा की सुरक्षा उपलब्ध कराना और लोगो की बचत को राष्ट्रीय निर्माण कार्यक्रमों में लगाना। बहुराष्ट्रीय बीमा कम्पनियाँ, जो हमारे देश में साझेदारी उपक्रम बना कर पहले ही आ चुकी है, या अब अपना कारोबार करना चाहती है, वे कम्पनियाँ है जो फारच्यून ग्लोबल 500 के 2006 के अंक में प्रकाशित सबसे ऊपर बैठी 100 कम्पनियों की सूची में स्थान पा चुकी हैं। इन 100 कम्पनियों में 12 बीमा कम्पनियां ऐसी हैं, जिनके हाथ में कुल बीमा कारोबार का 11.3 प्रतिशत हिस्सा है जो हमारे देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद के लगभग बराबर है।

भारत में कृषि संकट -डा. कृपाशंकर

किसान की सबसे बड़ी विडम्बना है कि वह स्वंय अपने द्वारा उत्पादित वस्तु का मूल्य निर्धारण नहीं करता। अकेला किसान ही ऐसा उत्पादक है। अब तक अन्य वस्तुओं के उत्पादक तो लागत से कई गुना मुनाफा कमाते हैं। परन्तु किसान के लिये लागत निकालना ही कठिन पड़ जाता है। फसल तैयार होने पर बहुत सी देनदारियों के लिये अपनी उपज तुरन्त बेचना उसकी मजबूरी रहती है। सभी किसानों द्वारा एक साथ बाजार में बेचने की विवशता के कारण मूल्य धराशायी हो जाता है।
यदि किसानों की संगठित सहकारी क्रय-विक्रय समितियाँ होतीं और गाँव-गाँव में उनके अपने गोदाम होते तो किसान अपनी उपज को इन गोदामों में रख कर उनकी जमानत पर बैंकों से अग्रिम धन पा सकता था ताकि वह अपनी तुरन्त की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें और व्यापारियों के हाथ सस्ते मूल्य पर अपने उत्पाद को उसे न बेचना पड़े।
ऐसी सहकारी क्रय-विक्रय समितियों का गठन करना बहुत कठिन काम नहीं था। इसकी पहली शर्त थी कि व्यापक पैमाने पर ग्रामीण गोदामों का निर्माण किया जाय। पंचायत भवन तो बने लेकिन गोदामों का निर्माण नहीं हुआ। यह आकस्मिक नहीं था। यदि सहकारिता के आधार पर ऐसी व्यवस्था की जाती तो किसानों की व्यापारियों पर निर्भरता समाप्त हो जाती। क्रय विक्रय समितियाँ उत्पाद पर कुछ मुनाफा लेकर बेचती जिस कारण कृषि उपज के मूल्यों में वृध्दि हो जाती जो सरकार को स्वीकार नहीं है। सरकार सार्वजनिक प्रणाली के लिये गेहूँ चावल जिस मूल्य पर खरीदती है उसमें उत्पादन लागत ही शामिल होती है मुनाफे के लिये कोई प्रावधान नहीं होता। तब भी किसान वहाँ अपना उत्पादन इस कारण बेचते है कि वह व्यापारी द्वारा लिये गये मूल्य से अधिक होता है। हाल ही में स्वामीनाथन समिति ने यह स्वीकार किया है कि सरकार किसानो की लागत मूल्य पर 50 प्रतिशत मुनाफा देकर खाद्यान्नों को खरीदे परन्तु सरकार ने इस सुझाव को अस्वीकार कर दिया है।
भारत वर्ष सस्ते कच्चे माल और सस्ती मजदूरी के बल पर वैश्वीकरण के दौर में संसार के बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकता है। सभी विकसित देशों ने मूल्यों के जरिये किसानों का शोषण करके ही औद्योगीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। भारत वर्ष भी उसी राह पर चल रहा है।
परन्तु यदि किसान को समुचित मूल्य नहीं मिलेगा तो न केवल उसके सामने जीविका का संकट रहेगा वरन् वह कृषि में कोई निवेश नहीं कर सकेगा जिसके अभाव में उत्पादन में वृध्दि नहीं हो सकेगी। देश में 70 प्रतिशत किसानों के पास आधा हेक्टेयर से कम भूमि है। एक हेक्टेयर में सकल कृषि उपज का मूल्य 30,000 रु. अनुमानित है। अत: लगभग तीन चौथाई किसान परिवार 15,000 रु. वार्षिक आमदनी पर जीवन यापन कर रहे हैं। गरीबी रेखा 21,000 रु. मानी गई है। गरीब किसान मजदूरी करके आय में कुछ वृध्दि करते हैं। परिवार में कुल लोग यदि बाहर चले गये है या किसी अन्य काम में लग गये है तो उनकी आय में कुछ वृध्दि होती है। परन्तु एक परिवार यदि कृषि पर ही निर्भर रहे तो उसके पास कम से कम 1 हेक्टेयर सिंचित भूमि होनी ही चाहिए ताकि वह गरीबी रेखा के ऊपर रह सके। देश में 80 प्रतिशत किसान परिवार के पास 1 हेक्टेयर से कम भूमि है।
अन्य देशों में विकास के साथ-साथ कृषि पर निर्भर लोगों की संख्या घटी पर भारत में ऐसा नहीं हो रहा है। स्वतन्त्रता के बाद से किसानों की संख्या ढाई गुना बढ़ी है जबकि बोये गये क्षेत्र में नाममात्र की वृध्दि हुई है। इस समय किसानों की संख्या में लगभग 2 प्रतिशत प्रतिवर्ष वृध्दि हो रही है, प्रति कृषक बोया गया क्षेत्र घट रहा है। सिंचाई के क्षेत्र में कोई विस्तार नहीं हो रहा है यद्यपि केन्द्र और राज्य सरकारें 25,000 करोड़ रुपया प्रतिवर्ष सिंचाई पर खर्च कर रही हैं। प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष अनाज का उत्पादन घट कर 174 किलोग्राम हो गया है तथा दालों का उत्पादन मात्र 12 किलोग्राम रह गया है। कृषि क्षेत्र में चोटी के 5 प्रतिशत के पास 40 प्रतिशत भूमि है।
इस यथार्थ के परिपेक्ष्य में यदि कृषि संकट को देखा जाय तो यह स्पष्ट होगा कि नीतियों में बगैर मूलभूत बदलाव के इस संकट का मुकाबला नहीं किया सकता।
मुख्य प्रश्न कृषि में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है। केवल चोटी के 2-3 प्रतिशत किसान ही अपनी बचत से कुछ निवेश करने में समर्थ हैं। कृषि एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें सार्वजनिक निवेश ही हो सकता है, जैसे नहर निकालना या गहरे नलकूपों का निर्माण जिसमें गरीब देश में तो प्रथम चरण में कार्य सार्वजनिक निवेश से ही निवेश के गतिरोध को दूर किया जा सकता है। अत: सार्वजनिक निवेश की प्राथमिकता कृषि क्षेत्र में होना चाहिए और इसके अन्तर्गत सिंचाई, मृदा एवं जल संरक्षण पर भी सबसे अधिक बल दिया जाना चाहिए।
अपने देश में जिस विकास की बात की गई, उसमे कृषि एजेन्डा पर नहीं है। कृषि संवर्गीय कार्य जैसे-पशुपालन, जलागम प्रबन्धन, वानकी, कृषि शिक्षा एवं शोध, बीमा, सहकारिता, कृषि विपणन, सिंचाई, ग्रामीण रोजगार पर बजट के 20 प्रतिशत से अधिक का कभी प्रावधान नहीं हुआ। यद्यपि लगभग 60 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिये वर्ष 2007-08 में केन्द्रीय बजट का आकार 6,80,000 करोड़ है परन्तु कृषि कार्य, बीमा, भण्डारण, सहकारिता, पशुपालन, शोध एवं शिक्षा पर 9400 करोड़ का ही प्रावधान है जो कुल बजट का 1.3 प्रतिशत है। कृषि बीमा पर कुल 2500 करोड़ का प्रावधान है। आवश्यकता इस बात की थी कि नाममात्र प्रीमियम पर सभी फसलों का बीमा हो। परन्तु बीमा योजना केवल सांकेतिक ही है। यदि फसल बीमा को सही मानों में लगभग नि:शुल्क चलाया गया होता तो फसल नष्ट होने के कारण प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में किसान आत्महत्या न करते। कृषि मंत्री ने कुछ समय पहले लोक सभा में बताया था कि 11,000 किसान प्रतिवर्ष आत्महत्या करते हैं जिसमें भारी संख्या में कर्ज न अदा करने वाले किसान हैं। ऋणग्रस्त किसानों को बिना व्याज के नया ऋण दिया जा सकता था ताकि वे पुराना कर्ज अदा कर दें। बैंकों को यदि थोड़ी ब्याज सब्सिडी दी जाती तो वे बिना ब्याज या बहुत कम ब्याज की दर पर ऋण दे सकते थे। ऐसे ऋणों की गारन्टी भारत सरकार ले सकती थी जैसा कि वह बड़े निकायों के ऋण के सम्बन्ध में करती है। भारत सरकार ने 1,00,000 करोड़ रुपयों की इस प्रकार भी गारन्टी ली है। किसानों को भी ऋण की गारन्टी दी सकती है।
यहां यह स्मरण रहे कि केन्द्र सरकार पुलिस पर लगभग 20,000 करोड़ रूपये व्यय कर रही है जब कि उपरोक्त कृषि कार्यों के लिये इसके आधे का ही प्रावधान होता है। आधी से अधिक भूमि आज भी असिंचित है परन्तु केन्द्रीय बजट में सिंचाई पर इस वर्ष कुल व्यय 872 करोड़ का प्रस्तावित है जो केन्द्रीय पुलिस बजट के बीसवें भाग से भी कम है। सिंचाई पर राज्य सरकारें अधिक व्यय करती हैं। परन्तु सरकारी व्यय का यह आलम है कि केन्द्र एवं राज्य द्वारा सिंचाई पर प्रतिवर्ष 25,000 करोड़ व्यय करने के बावजूद सिंचित क्षेत्र स्थिर है। ऐसा इसलिये है कि विकास के नाम पर बेवजह अफसरों और कर्मचारियों की भर्ती हुई है जिनके वेतन और भत्तो पर ही कृषि बजट का 70 प्रतिशत निकल जाता है।

देश के 80 प्रतिशत किसानों के पास भूमि इतनी कम है कि वह जीविका के लिये पर्याप्त नहीं है। उन्हें कृषि के बाहर काम मिलना चाहिए परन्तु सरकारी नीतियां ऐसी हैं कि संगठित क्षेत्र में रोजगार घट रहा है। 2004 में इसमें 5 लाख की गिरावट आई। परन्तु इस विशाल जन समुदाय को ग्राम की प्राकृतिक सम्पदा के संवर्धन उन्नयन में लगाया जा सकता है। देश में लगभग 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि ऐसी है जिसका कोई उपयोग नहीं हो रहा है। जलागम प्रबन्धन के आधार पर इस भूमि को उपयोगी बनाया जा सकता है। यदि वर्षा के पानी को समुचित ढंग से इकट्ठा किया जाय तो इस भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ सकती है। जहां भूमि बहुत खराब है उसे तालाबों और पोखरों में बदला जा सकता है। जल संचय का प्रावधान न होने के कारण पलामू, जहाँ पंजाब से दूनी वर्षा होती है, सूखा ग्रस्त है। यही हालत देश के बड़े भूभाग की है। अकेले जल प्रबन्धन पर ही तमाम बेरोजगार लोगों को काम पर लगाया जा सकता है और 60 प्रतिशत कृषि भूमि जो असिंचित है उसे सिंचित किया जा सकता है। परन्तु जलागम प्रबंधन के लिये भारत सरकार के बजट में मात्र 1,000 करोड़ रुपये का ही प्रावधान है। देश में जिस प्रकार सुरक्षा के लिये एक सेना है उसी प्रकार भूमि और जलागम प्रबंधन आदि कार्यों के लिये भी एक भूमि सेना खडी की जा सकती है जो भूमि के समतलीकरण, जलसंचय, वृक्षारोपण आदि कार्य में निरन्तर लिप्त रहे। एक व्यक्ति को 30,000 रू. की वार्षिक मजदूरी पर (रु. 100 प्रतिदिन वर्ष में 300 दिन के लिये) 40,000 करोड़ रुपये में 1 करोड़ की स्थाई भूमि-सेना खड़ी की जा सकती है जो एक बहुत ही उत्पादक कार्यक्रम से जुड़ी रहेगी।

संविधान के 73वें संशोधन के अनुसार ग्राम विकास से सम्बन्धित सारे कार्य ग्राम पंचायतों के माध्यम से होना चाहिए, वहाँ नौकरशाही के लिये कोई स्थान नहीं होगा। परन्तु देश में भ्रष्ट नौकरशाही और राजनेताओं का ऐसा गठबंधन है कि कोई भी राज्य सरकार संविधान के इस निर्देश पर अमल करने के लिये तैयार नहीं है जिसके फलस्वरूप लोगों में उदासीनता है और भ्रष्टाचार का बोलवाला है। ऐसी स्थिति में विकास कार्यों पर बजट बढ़ा देना ही पर्याप्त नहीं है। इसमें लोगों की भागीदारी भी सुनिश्चित किया जाय। फिर भी सार्वजनिक निवेश को बढ़ाना अपरिहार्य है। साधनों के अभाव में कृषि एवं ग्राम विकास आदि पर बहुत कम खर्च हो रहा है। भारत सरकार ने सभी वर्गों और कम्पनियों की आय आदि पर इतनी छूट दे रखी है कि जितना राजस्व वसूल होता है उसका आधा छूट में निेकल जाता है। इस प्रकार वर्ष 2007-08 में केन्द्रीय बजट के अनुसार 2006-07 में सरकार को 2,35,191 करोड़ रुपयों की हानि हुई। यदि इन छूटों को वापस ले लिया जाय तो कृषि, ग्राम विकास, भूमि एवं जल संसाधन विकास का केन्द्रीय बजट पांच गुना बढ़ाया जा सकता है।

इस दिशा में बैंकों का भी बड़ा योगदान हो सकता है क्योंकि वे 20 लाख करोड़ रु. का ऋण बांटते हैं परन्तु इसमें ग्रामीण क्षेत्र का अंश 10 प्रतिशत ही है। विचित्र बात यह है कि ग्रामीण शाखाओं से प्रतिवर्ष 1,00,000 करोड़ रुपया तथा अर्ध्द नगरीय शाखाओं से 2,00,000 करोड़ रुपया नगरों और महानगरों की ओर प्रवाहित हो जाता है। यदि ग्रामवासियों को बैंकों द्वारा दिये जाने वाले ऋण की सरकार गारन्टी ले तो बैंकों को ऋण देने में कोई कठिनाई नहीं होगी। ग्रामवासियों को भी इसी प्रकार की गारन्टी देकर ग्रामीण अंचल की बचत को ग्रामीणों के लिये उपलब्ध किया जा सकता है। बैंक अपने ऋण का एक तिहाई उनको देते हैं जो 25 करोड़ रुपये से अधिक ऋण लेते हैं। यही लोग ऋण वापस नहीं करते। किसान ऋण वापस करने में असमर्थ होने पर आत्महत्या कर लेता है लेकिन नगरों के बड़े घाघ, जिन पर लाख करोड़ रुपयों से ज्यादा बकाया है कभी आत्महत्या नहीं करते। उनके अन्दर कोई नैतिकता नहीं है। उनका करोड़ों का बकाया प्रति वर्ष माफ कर दिया जाता है।

सरकार द्वारा किसान और किसानी की उपेक्षा का लाभ अब देशी और विदेशी बड़ी कम्पनियां उठाना चाहती हैं। वे किसानों से ठेके पर खेती कराकर मुनाफा कमाना चाहती हैं। वे किसानों को खाद, बीज आदि उपलब्ध करायेंगी तथा उनकी उपज को तत्काल खरीद कर कुछ बढ़ा हुआ मूल्य देंगी। परन्तु किसान को वहीं फसल बोना होगा जिसे वे चाहेंगी। इससे किसान को क्षणिक लाभ हो सकता है परन्तु देश की कृषि व्यवस्था का मुनाफाखोरों के हाथ में चला जाना घातक होगा। सरकार भी इसी नीति को बढ़ावा दे रही है क्योंकि स्वयं वह खेती के उध्दार के लिये कुछ नहीं करना चाहती। ऐसी स्थिति में कृषि का संकट और गहन होता जायेगा। इस वर्ष विदेशों से सरकार 1 करोड़ टन गेहूँ का आयात 1300 रु. प्रति टन के हिसाब से करने जा रही है परन्तु अपने किसानों कां 850 रुपये से अधिक देने के लिये तैयार नहीं है। देश का पैसा विदेशों में चला जाये परन्तु अपने किसान को न मिले, यही सरकारी नीति है।

बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद -डॉ. बनवारी लाल शर्मा

(देश में गहरा आक्रोश है। जरूरत इस बात की है कि यह आक्रोश क्रांतिकारी परिस्थितियों के निर्माण की दिशा में बढ़े। ऐसे में आत्मविश्वास के साथ पश्चिमी चुनौती को स्वीकार कर आजादी की नई लड़ाई में कूदने का वक्त आ गया है।)

भारत में अंग्रेजियत की नींव डालने वाले लार्ड मैकाले ने एक बार भारतीयों के बारे में कहा था, 'केवल अपने नाक-नक्शे में ही वे देशी हैं, अन्यथा अपने अंदाजों में, मस्तिष्क की आदतों में और यहां तक कि शुध्द मनोवेगों में भी वे यूरोपीय होंगे।' मैकाले को विश्वास था कि भारतीय मानस को जड़ से प्रभावित करने के लिए उसने जिस शिक्षा प्रणाली की नींव डाली थी, वह जरूर उसकी भविष्यवाणी को सिध्द करेगी। हमारे देश के नीति-निर्माताओं को अफसोस है कि मैकाले की बात पूरी खरी क्यों नहीं उतर रही है। तभी तो राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने बड़े अफसोस के साथ कहा कि दो सौ साल अंग्रेज इस देश में रह गए और केवल दो फीसदी ही देशी लोग अंग्रेजी जानते हैं। इस गलती को दूर करने के लिए राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने संस्तुति की है कि देश के बच्चों को पहली कक्षा से लेकर बारहवीं कक्षा तक अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढ़ाई जानी चाहिए। आयोग तो पहल कर ही रहा है, शिक्षा का धन्धा करने वाले गांव-गांव में 'इंग्लिश मीडियम' के 'पब्लिक स्कूल' खोल रहे हैं, जिनमें पिचके गाल वाले कुपोषित बच्चे भी टाई बांधे 'ए' से 'एप्पल' रटते दिखते हैं।

उपनिवेशकाल में भारत के पढ़े-लिखे लोगों में यूरोप-केन्द्रित दृष्टि इतनी जम गयी कि आज भी वह वर्ग उसको दुहराने और उसका उपकार जताने में किसी प्रकार की हया-शर्म महसूस नहीं करता। सितम्बर 1996 में भी पी. चिदम्बरम आज की तरह भारत सरकार के वित्तामंत्री थे और अपनी उदारीकरण की नीतियों के कारण पश्चिम की दुनिया के दुलारे थे। वे वाशिंगटन में व्यवसायियों के एक सम्मेलन को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने अमरीकी उद्यमियों से कहा था, 'आप में से उन लोगों से, जो भारत आना चाहते हैं, मुझे यह कहना है कि आप लम्बे समय के लिए वहां आइए। पिछली बार आप भारत पर एक दृष्टि डालने के लिए आए थे। आप दो सौ साल ठहरे। इसलिए इस बार, अगर आप आएं तो और दो सौ साल रहने के लिए तैयारी करके आएं। वहीं सबसे बड़े प्रतिफल हैं।'

वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तो दो कदम आगे बढ़ गये। 8 जुलाई 2005 को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि ग्रहण करने पर व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा था, 'आज बीते समय को पीछे मुड़कर देखने से जो संतुलन और परिप्रेक्ष्य मिलता है, उससे एक भारतीय प्रधानमंत्री के लिए दावे के साथ कहना संभव है कि भारत का ब्रिटेन के साथ का अनुभव लाभकारी भी था। कानून, संवैधानिक सरकार, स्वतंत्र प्रेस, पेशेवर नागरिक सेवा, आधुनिक विश्वविद्यालय और शोध प्रयोगशालाओं के बारे में हमारी अवधारणाओं ने उस कढ़ाव में स्वरूप ग्रहण किया है, जहां एक युगों पुरानी सभ्यता उस समय के प्रबल साम्राज्य से मिली। ये वे सभी तत्व हैं जिन्हें हम अभी भी मूल्यवान समझते हैं और जिनका आनन्द लेते हैं। हमारी न्यायपालिका, हमारी कानून व्यवस्था, हमारी अफसरशाही और हमारी पुलिस, सभी महान संस्थाएं हैं जो ब्रितानी-भारतीय प्रशासन से निकली हैं और उन्होंने देश की अच्छी सेवा की है। ब्रिटिश राज की सभी धरोहरों में अंग्रेजी भाषा और आधुनिक विद्यालय व्यवस्था से ज्यादा महत्वपूर्ण और कोई धरोहर नहीं।'

दरअसल, ये सबसे महत्वपूर्ण धरोहरें, अंग्रेजी भाषा और विद्यालय व्यवस्था ही हैं, जो पश्चिम केन्द्रित दृष्टि को केवल टिकाए ही नहीं रही हैं, बल्कि उसे आजादी के इन साठ सालों में आगे भी बढ़ाया है। उपनिवेश काल में स्थापित हुई शिक्षण संस्थाओं की तर्ज पर बनी शिक्षण संस्थाएं पश्चिम के मूल्यों को बढ़ा रही हैं और उनमें प्रशिक्षित बुध्दिजीवियों द्वारा प्रतिपादित सिध्दान्तों और व्यवस्थाओं का वफादारी के साथ अनुसरण्ा भी कर रही हैं। 'कृषि, शोध, शिक्षण और प्रशिक्षण में भारत-अमरीकी ज्ञान पहल' (इंडो-यूएस नॉलेज इनीशिएटिव ऑन एग्रीकल्चर रिसर्च, एजूकेशन एण्ड ट्रेनिंग) इस मानसिकता का ताजा उदाहरण है। भारत में कृषि पर शोध-अध्ययन की नीतियां यह 'ज्ञान-पहल' बना रहा है जिसमें सात सदस्य भारतीय और सात अमरीकी हैं। अमरीकी सदस्यों में प्रमुख सदस्य अमरीकी बीज कम्पनी मोनसेंटो और खुदरा बाजार की सबसे बड़ी कम्पनी वाल-मार्ट के उच्च अधिकारी हैं। अन्न की बड़ी अमरीकी सौदागर कम्पनी एडीएम (आर्थर-डेनियल-मिडलेंड) भी शामिल है। यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि भारत की खेती की दिशा क्या होगी। एक के बाद एक सरकारें जो कृषि नीतियां घोषित कर रही हैं, उनके अदृश्य लेखकों के नाम कहीं खोजने की जरूरत नहीं है।

यह प्रक्रिया यहीं रुक नहीं रही है। वाणिज्य मंत्रालय की पहल पर मानव संसाधन मंत्रालय ने एक बिल तैयार किया है जिसे कैबिनेट की मंजूरी मिल गयी है। इस बिल के पास हो जाने पर विदेशी विश्व विद्यालयों और उच्च शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थाओं को भारत में अपने कैम्पस खड़े करने की इजाजत मिल जाएगी। ये संस्थाएं भारतीय मानस को और भी पश्चिम केन्द्रित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

दरअसल, आजादी के इन साठ सालों में क्रमिक रूप में अंग्रेजों के राज्य-उपनिवेशवाद के उत्ताराधिकारी के रूप में 'बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद' (कारपोरेट कॉलोनियलिज्म) कायम हुआ है। अंग्रेजों के बाबुओं की उत्ताराधिकारी, अब 'साइबर बाबुओं' की एक बड़ी जमात बड़े-बड़े नगरों में दिखाई पड़ती है, जो 'निशाचर' बनकर पूरी रात अमरीकी और यूरोपीय कंपनियों के लिए चन्द टुकड़ों पर खटती-मरती रहती है और जिसकी अच्छी-खासी ऊर्जा अमरीकी लहजे में बात करना सीखने में खर्च होती है। भाषा, भेष और भोजन सभी में वे गलती से भारत भूमि में पैदा हुए अमरीकी-यूरोपीय लगते हैं।

समाज का एक वर्ग होता है जो उपनिवेश काल में फूलता-फलता है। यह वह वर्ग है जो उपनिवेशी ताकतों के सामने आत्मसमर्पण कर देता है और उपनिवेशी ताकतों की लूट का एक अंश मदद के बदले में पा लेता है। कारपोरेटी उपनिवेश काल के वर्तमान दौर में इस वर्ग ने तरक्की की है और इस तरक्की के कुछ मानक गिना दिए जाते हैं।

देश में उन्नति के अन्य मानक भी राजनेता और अर्थशास्त्री गिना देते हैं। निवर्तमान राष्ट्रपति ने तो भारत को महान देश होने की एक तारीख 2020 तय कर दी है, पर इस तरक्की की चमकीली परत को जरा सा नाखून से खुरचने पर देश की असली तस्वीर उभर आती है। विश्व का इतिहास गवाह है कि उपनिवेशवाद पूंजीवाद के विस्तार के लिए खड़ा हुआ और हो रहा है और यह पूंजीवाद क्रूरतम हिंसा और वीभत्स शोषण पर खड़ा हुआ है। आज देश में संविधान को धता बताते हुए पूंजीवादी व्यवस्था बड़ी तेजी से स्थापित की जा रही है। सरकार की भूमिका मात्र फेसीलीटेटर की रह गई है। देश देशी-विदेशी पूंजीपतियों को सौंप दिया गया है। आमजन कहीं पूंजीपतियों के इरादों में अड़ंगा लगाते दिखते हैं, तो सरकारें उन पर गोली चलाकर अपना कर्तव्य पूरा करती हैं, जैसा कि पूरी दुनिया ने पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में हाल ही के दिनों में देखा। देश में सभी नीतियां- देशी विदेशी कारपोरेट घरानों के इशारों पर बन रही हैं। यह अब जगजाहिर है कि अमरीका के साथ भारत के न्यूक्लियर समझौते में जनरल इलेक्ट्रिक (जी ई) जैसी अनेक कंपनियों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च करके लाबिंग की थी। विशेष आर्थिक क्षेत्रों-सेज को विदेशी इलाके (फॉरेन टैरीटरी) घोषित करके उपनिवेश कायम करने की चल रही प्रक्रिया पर सरकार ने अपनी मुहर लगा ही दी है।

यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना विजय-कूच करने में जिन संस्थाओं से हवाई संरक्षण (एअर कवर) लेती हैं, उनमें प्रमुख हैं-विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ)। पहली दो संस्थाएं कर्ज के हथियार का, और तीसरी व्यापार के हथियार का इस्तेमाल करके भारत को तृतीय विश्व (व्यापार) युध्द में परास्त कर चुकी हैं और विधिवत 'बाजार' को विजयी घोषित कर दिया गया है।

परास्त देश के जो लक्षण होते हैं, वे देश में दिख रहे हैं, भले ही मीडिया का ढोल पीटकर और चकाचौंध दिखाकर उससे दृष्टि हटाने की कोशिश हो रही है। कौन नहीं जानता है कि इस देश में पिछले कुछ सालों में कोई सवा लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यह सिलसिला थम नहीं रहा है। बेरोजगारी का तो यह आलम है कि चन्द पदों के लिए लाखों युवक-युवतियों की भीड़ पुलिस की लाठी खाने को जमा हो जाती है। गैर-बराबरी का तो आलम यह है कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में मलिन बस्तियों में रहने वालों की आबादी साठ फीसदी है और देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में मलिन बस्तियों से ज्यादा जगह कारें घेरती हैं। कुपोषण का यह हाल है कि देश के कोई आधे बच्चे 5 साल से ज्यादा जीवित नहीं रह पाते। हिंसा, असुरक्षा का यह आलम हे कि देश में 5 साल से लेकर 70 साल तक की महिला अपने को यौन शोषण से सुरक्षित महसूस नहीं करती। गोलीबारी, हत्या, लूटपाट, आतंकवाद तो भारतीय जीवन का अंग ही बन गए हैं।

देश में इन सबके कारण आक्रोश है। चिन्ता की बात यह है कि यह आक्रोश गृह-युध्द की दिशा में न बढ़ जाए, जिसके लक्षण कुछ-कुछ दिख रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि यह आक्रोश देश में क्रान्तिकारी परिस्थितियों के निर्माण की दिशा में बढ़े। देश के युवा चमक-दमक के पीछे छिपी बहुराष्ट्रीय गुलामी को समझें। आत्मविश्वास के साथ इस पश्चिमी आक्रमण की चुनौती को स्वीकार करें और आजादी की नयी लड़ाई में कूदें।

विकास या विकास का आतंक -अमित भादुरी

चरम विकास के इस दौर में यह कोई चौंकाने वाला तथ्य नहीं है कि भारत के अंदर दो भारत हैं। एक वह भारत है जहां बड़ी-बड़ी इमारतें, शानो-शौकत, चमचमाते शॉपिंग माल्स और उच्च तकनीक से बने गगनचुम्बी पुल, जिन पर नजर आती हैं दूर तक, दौड़ती हुई नई-नई आधुनिक गाड़ियां। यह उस वैश्विक भारत की तस्वीर है जो प्रथम विश्व यानी विकसित विश्व के प्रवेश द्वार पर खड़ा है।

दूसरा है दीन-हीन भारत, जहां नजर आते हैं निसहाय किसान, जो विवश हैं आत्महत्या करने के लिए, अवैधानिक रूप से मरते हुए दलित, अपनी ही कृषि भूमि और जीविका से बेदखल की हुई जनजातियां, चमचमाते शहरों की गलियों में भीख मांगते छोटे-छोटे बच्चे। इस दूसरे भारत के दीन-हीन व्यक्ति के विद्रोह के स्वर से आज देश के लगभग 607 में से 120-160 जिलों में उग्र नक्सलवादी आन्दोलन के रूप में गूंज रहे हैं। विडम्बना तो यह है कि चमचमाते हुए पहला भारत ने निराशा, विद्रोह और अमानवीय गरीबी से घिरे दूसरे भारत से मुंह मोड़ लिया है। दोनों भारत के बीच बढ़ती हुई यह असमानता ही केवल चिंता का विषय ही नहीं है, इससे भी अधिक घृणित कार्य, केंद्रीय और राज्य सरकारों के ध्यान न देने के कारण हो रहा है, जिसने दोनों भारत के बीच एक बड़ी खाई को पैदा की है। साथ ही गरीब भारत में गरीबी और दुखों को और भी अधिक बढ़ा दिया है।

भूमंडलीकरण के इस दौर में विकास तो हो रहा है, लेकिन की इस मंजिल को पाने के लिए और राष्ट्र-राज्यों के लिए बाजार संतुलन बनाने के लिए आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण रूपी सीढ़ियों का प्रयोग किया जा रहा है। राज्य और बाजार के बीच संघर्ष और सहयोग की जटिल प्रक्रिया के कारण 19वीं शताब्दी में पूंजीवाद विकसित हुआ। बाजार हित को बढ़ाते हुए राज्य ने इसे समय-समय पर नियंत्रित भी किया जैसे- निश्चित कार्यविधि, बाल-श्रम पर रोक और समय-समय पर व्यापार संघों को वैधता प्रदान करना। कार्ल पोल्यानी ने इस सारी प्रक्रिया को 'महान परिवर्तन' की संज्ञा दी है जो कि राज्य और बाजार की 'दोहरी प्रक्रिया का परिणाम है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें बाजार के नियम राज्य द्वारा प्रतिपादित किए जाते हैं। जब राज्य ऐसा करने में असफल रहता है तो मुक्त बाजार और स्वच्छंदता की स्थिति उत्पन्न होती है, जिससे गरीबी बढ़ने से गरीबों का विद्रोह और भी बढ़ने लगता है।

उसे हम आर्थिक प्रक्रिया का एक बुरा पहलू ही कहेंगे कि यह हमेशा रहस्य ही होता है कि बाजार और बाजारीय नियम कैसे बनते हैं, इसकी व्याख्या की यहां जरूरत नहीं है जैसे- मांग और पूर्ति के उतार-चढ़ाव के आधार पर अर्थशास्त्री मुद्रा-प्रसार और मुद्रास्फीति की गणना करते हैं लेकिन वे यह नहीं बताते कि आखिर दाम कौन निश्चित करता है? स्थिति तब और भी बुरी हो जाती है जब राज्य की ओर से बड़ी-बड़ी कंपनियां बाजार के नियम तय करने लगती हैं। वास्तव में भूमंडलीकरण के झंडे के नीचे भारत में यही सब हो रहा है। हम एक ऐसे विचारहीन और दिशाहीन समय में जी रहे हैं जहां आर्थिक वृध्दि के नाम पर गरीबों का सब कुछ छीना जा रहा है।

संघीय और राज्य सरकार की भूमि-अधिग्रहण नीतियों के तहत बड़ी कंपनियों द्वारा विभिन्न रूपों में भूमि पर कब्जा किया जा रहा है। औद्योगीकरण के नाम पर जीविका का विनाश, गरीबों का विस्थापन, सिंचाई और बिजली उत्पाद के लिए बड़े-बड़े बांध, किसानों द्वारा आत्महत्याएं किए जाने के बावजूद भी खेती का निगमीकरण और बस्तियों को समाप्त कर शहरों के सौंदर्यीकरण तथा आधुनिकीकरण में प्रतिकूल विकास की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। सितम्बर 2006 तक वाणिज्य मंत्रालय ने पूरे भारत में कुल 267 'विशेष आर्थिक परियोजनाओं के लिए तथा 'राज्य औद्योगिक विकास निगमों' द्वारा 1,34,000 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहीत की गई है और निगमों को 'खनन संबंधी अधिकार अधिकांशत: आदिवासियों के भूमि पर दिए गए हैं। संघीय सरकार की नीतियों से सहायता और प्रोत्साहन पाकर राज्य सरकारें, निगमों को और ज्यादा जमीन देने के लिए प्रयास कर रही हैं।

इसी संदर्भ में वर्ष 2006 के प्रारंभ में ही उड़ीसा के कलिंगनगर में 12 लोगों द्वारा टाटा को खनन के लिए भूमि न सौंपने पर पुलिस द्वारा किया गया अमानवीय व्यवहार स्मरणीय है। नव वर्ष सामने है, टाटा के लिए पश्चिम बंगाल के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री राज्य में आतंक फैलाने के लिए तैयार है। 'पंचायत एक्सटेंशन टू शेडयूल्ड एरियाज अधिनियम 1996' के अनुसार भूमि अधिग्रहण के लिए ग्राम सभा का परामर्श अनिवार्य है जबकि झारखंड, उड़ीसा में इस नियम को ताक पर रख दिया गया है। इससे भी बढ़कर एक ताजा रिपोर्ट के आधार पर ज्ञात हुआ है कि पुलिस द्वारा ग्राम सभा के सदस्यों का घेराव करके जबरदस्ती मनमानी दामों पर भूमि सौंपने के प्रस्ताव पर स्वीकृति देने के लिए विवश करते हुए टाटा के लिए सिंगूर (पश्चिमी बंगाल) में भूमि अधिग्रहण और दादरी (उत्तर प्रदेश) में अनिल अंबानी के लिए भूमि प्राप्ति के लिए इसी प्रक्रिया को दोहराया गया और यह भी कहा गया कि सूचना अधिकार अधिनियम के तहत भूमि प्रयोग के 'कान्टै्रक्ट' को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। यद्यपि एक स्थानीय टीवी चैनल ने रिपोर्ट दी कि पश्चिम बंगाल सरकार ने मुआवजे के तौर पर 140 करोड़ रुपए दिए, जबकि टाटा पांच वर्ष के बाद सौदे के अनुसार बिना स्टाम्प डयूटी, मुफ्त पानी के साथ मात्र बीस करोड़ रूपये ही अदा करेगी। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 31 मई 2006 तक पश्चिम बंगाल राज्यमंत्रिमंडल ने विभिन्न राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा संचालित परियोजनाओं के लिए 36325 एकड़ भूमि प्राप्ति की स्वीकृति दे चुकी है। यह आंकड़ा 70,000 एकड़ को भी पार कर सकता है। यदि सलेम ग्रुप को हावड़ा और बरासत रायचौक एक्सप्रेस वे के लिए बरासत भी सौंप दिया जाएं।

आज हम स्पष्ट यह देख रहे हैं कि बड़ी निगमों के हितों के लिए पश्चिम बंगाल में गरीब लोगों की जड़ खोदी जा रही है, शायद इस उम्मीद से कि निगम पश्चिम बंगाल में कुछ चमत्कारी परिवर्तन करेंगे, जो वो खुद करने में असमर्थ हैं। उनके पास निगमीय पूंजीवाद के आगे समर्पण करने के अतिरिक्त शायद कोई विकल्प नहीं बचा। विकास के इस दौर में भूमंडलीकरण का यह रूप 'टीना सिंड्रोम' ( टीआईएनए-इसका कोई विकल्प नहीं) को प्रदर्शित करता है।

टीना सिंड्रोम इस बात का समर्थन करता है कि निगम आर्थिक वृध्दि की दर बढ़ाकर गरीबी दूर करेंगे। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रकोष, विश्वबैंक और एशियन विकास बैंक (एडीबी) ने भी विभिन्न रूपों में इसी तथ्य का समर्थन किया है और माक्र्सवादी नेताओं का एक बड़ा हुजुम भी इसी बात का राग अलाप रहे हैं। लेकिन अफसोस इस बात का है कि विकास के इस मॉडल को 2004 के आम चुनाव में विशेषत: आंध्र प्रदेश में नकारा जा चुका है। हो सकता है कि एक बार फिर से 'निगम संचालित विकास' की विचारधारा को पश्चिम बंगाल या कहीं और भी नकार दिया जाए।

भारत के प्रसंग में इस विचारधारा के दो रूप हैं। एक केन्द्रीय सरकार विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय बैंकों से बड़ी मात्रा में ऋण ले रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्वबैंक द्वारा ढांचागत उद्योगों के क्षेत्र में बड़ी परियोजनाओं में बहुराष्ट्रीय निगमों को लगाकर सरकारों को विकास कार्य के लिए ऋण लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसमें समझौते आदि के नियम विश्वबैंक निर्धारित करता है। परिणामत: देश खुद को कर्ज के जाल में फंसा हुआ पाता है। अभी कुछ समय पूर्व तक मध्य और लातिनी अमेरिका के अधिकांश देश इसी विकासगत आदर्श के उदाहरण थे लेकिन अब अर्जेंटीना, ब्राजील, बोलीबिया, इक्वाडोर और बेनेजुएला जैसे अनेक देशों ने ऋण आधारित विकास के इस रास्ते को नकार दिया है।

इस विचारधारा का दूसरा रूप है राज्यों की दृढ़ स्थिति। बहुराष्ट्रीय निगमों के साथ प्रतियोगिता करने के लिए विशेषत: विश्व बाजार में राज्य संचालित निगमों का निर्माण और पोषण किया जा रहा है और सरकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां राष्ट्रीय निगम किन्ही विशेष कारणों से रुचि नहीं लेते, आकर्षित करने का प्रयास कर रही है। यह भी एक विचारणीय पहलू है कि कहीं उच्चतर विकास को प्राप्त करने के लिए सरकार जनता पर होने वाले इसके नकारात्मक प्रभावों को अनदेखा न कर दे। राज्य संचालित निगमों के संदर्भ में आधुनिक चीन पूर्णतया विवेकपूर्ण कदम उठाने वाला देश दिख हो रहा है, जबकि दक्षिण कोरिया ने राजनैतिक और भू राजनैतिक स्थिति में परिवर्तनों और पूर्व में कर्ज निर्भरता होने के बावजूद भी इसी रास्ते को अपनाया है। चीन का यह निगम आधारित विकास का रास्ता दो रूपों में भ्रामक है। पहला- जहां तक प्रकृति और निगमों को समर्थन देने का सवाल है, चीनी सरकार राज्य संचालित निगमों और विदेशी निवेशकों के बीच आवश्यकतानुसार अलग-अलग तरह से व्यवहार करती है। लेकिन एक सरकार जो अंतर्राट्रीय मुद्राकोष और विश्वबैंक के निर्देशन में ऋण का रास्ता अपनाना चाहती है, उसके लिए यह संभव नहीं है। दूसरा- चीनी व्यवस्था जो निगम आधारित विकास के इस लक्ष्य को पाने के लिए समय-समय पर कानूनों में फेर-बदल करके और आम जनता के अधिकारों को दबाकर जो रास्ता अपनाती है, वह हमारे लिए सम्भव नहीं है।

अंतत: चर्चा का विषय यह नहीं है कि चीन या अन्य देश क्या कर रहे हैं। गरीबों के प्रतिकूल निगमीय विकास के आतंक पर राज्य की निर्भरता अब नकार दी गयी है या नहीं, यह भी चर्चा का विषय नहीं है। भारतीय संदर्भ में केन्द्र राज्यों की साझा सरकारों के राजनैतिक दबाव से नियंत्रित हो रहा है। इस समय हमारे सामने दोहरी चुनौती है। हमें उस उच्च विकास का विरोध करना है, जो राज्य द्वारा निगम आधारित विकास के आतंक का पोषण करता है। मेधा पाटकर का नर्मदा बचाओ आन्दोलन इस दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। ऐसे ही समय पर हमें विकास के नए विकल्प को खोजना है। यद्यपि वर्तमान समय में संभावनाएं बहुत कम हैं। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम राज्यों की पंचायतों को इसे लागू करने के लिए वित्तीय स्वायत्ता प्रदान करता है, और ग्रामसभाओं को भूमि प्रयोग के लिए पूरा नियंत्रण देता है। सूचना के अधिकार द्वारा शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही आदि को बहुत दूर तक ले जाने की आवश्यकता है। विकेंद्रीकृत सरकार द्वारा भारतीय जनता को रोजगारपरक और उत्साहित किया जाना चाहिए। विकास की इस तस्वीर को देखते हुए यही समय है जब सत्ता में बैठी सरकार और राजनैतिक दलों के कार्यों का निरीक्षण किया जाना चाहिए।

जज कानून से ऊपर तो नहीं: प्रशांत भूषण

हाल में टीवी पत्रकार विजय शेखर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी भरी टिप्पणी की थी। उससे लोगों की यह धारणा मजबूत ही हुई है कि न्यायपालिका अपने भीतर की सड़ांध को छिपाने के लिए अपने अवमानना अधिकारों का प्रयोग करने की कोशिश करती है। शेखर ने यह दिखाने के लिए स्टिंग ऑपरेशन किया था कि किस तरह भ्रष्ट तरीकेसे गुजरात की अदालतों से गिरफ्तारी वारंट हासिल किया जा सकता है। मीडिया और सभ्य समाज को न्यायपालिका के अपने अवमानना अधिकारों के प्रयोग की कोशिश का पुरजोर विरोध करना चाहिए। अगर हम अवमानना की कार्रवाई की धमकियों से डरते रहेंगे तो अपने गणतंत्र के भीतर एक गैरजवाबदेह न्यायिक तानाशाही को पनपने देने के दोषी होंगे।

यही सोच कर इस साल मार्च में दिल्ली में आयोजित नेशनल पीपुल्स कॅन्वेंशन में न्यायिक जिम्मेदारी एवं सुधार अभियान का गठन किया गया। इसका उद्देश्य न्यायिक जिम्मेदारी एवं सुधार अभियान शुरू करने के लिए सभ्य समाज को संगठित करना है जो न्याय के वास्तविक उपभोक्ता हैं। इस अभियान का गठन इस पीड़ादायक अनुभव के बाद किया गया कि न्याय प्रणाली की सड़ांध को दूर करने के लिए न तो क्रमिक सरकारों ने कुछ किया और न ही न्यायपालिका ने। वे उच्च न्यायपालिका के लिए कोई वास्तविक जिम्मेदारी लागू करने के प्रति भी गंभीर नहीं रही हैं। हमने मससूस कियाकि जब तक इस देश के आम लोग, जिनका न्यायिक प्रणाली से साबका पड़ता रहता है, कोई मजबूत और मुखर अभियान शुरू नहीं करेंगे, इस दिशा में कोई ठोस काम नहीं होगा। हमारा अभियान न्यायपालिका की व्यवस्थापरक समसयाओं और न्यायिक कदाचार के वैयक्तिक मामलों से संबंधित मुद्दों को उठाने की एक छोटी शुरुआत है। हमने अभियान की एक वेबसइट बनाई है। जिसमें न्यायिक सुधार, जज वाच, जजमेंट वाच आदि पर अलग-अलग खंड हैं। अतीत के न्यायिक कदाचार के कई मामलों का अध्ययन भी वेबसाइट पर दिया गया है। हम अब इस तरह के कदाचारों के कई मामलों का अध्ययन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हाल ही में न्यायपालिका के सबसे ऊंचे स्तर पर आए।

पिछले साल 16 फरवरी को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायधीश वाई के सब्बरवाल ने एक विस्तृत आदेश के जरिए दिल्ली के निर्दिष्ट रिहायशी इलाकों में उन मकानों की सीलिंग करने की प्रक्रिया शयुरू कर दी जिनका वाणिज्यिक इस्तेमाल किया जा रहा था। इस आदेश को लागू करने के लिए शुरू हुए अभियान में दुकान और ऑफिस सरीखे वाणिज्यिक इस्तेमाल वाले हजारों मकानों को सील कर दिया गया। इनमें से कई दुकानें और ऑफिस दशकों से चल रहे थे। नतीजा यह कि इनके मालिकों को शॉपिंग मॉल या वाणिज्यिक परिसरों में दुकान खरीदने या किराए पर लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह अभियान मुख्य न्यायधीश सब्बरवाल की पीठ की निरंतर निगरानी में कड़ाई से चलता रहा। कोर्ट ने सीलिंग अभियान पर नजर रखने और उसे निर्देश देने के लिए एक कमेटी नियुक्त कर दी थी।

कोर्ट का आदेश दिल्ली मास्टर प्लान 2001 से संबंधित कानूनों को लागू करवाने का था। कोर्ट ने जिन इलाकों में वाणिज्यिक इस्तेमाल वाले परिसरों को सील करने के आदेश दिए थे, वे इलाके के दिल्ली मास्टर प्लान 2001 में आवासीय इस्तेमाल के लिए निर्दिष्ट किए गए थे। लेकिन इस तरह की परिस्थितियों कानून के शासन को लागू करने के दो तरीके थे। या तो वाणिज्यिक इस्तेमाल वाली रिहायशी परिसरों को सील करने का आदेश दिया जाता या फिर अधिकारियों को मास्टर प्लान बदलने और उन इलाकों की जमीन के इस्तेमाल में परिवर्तन के लिए कहा जाता जहां लंबे समय से वाणिज्यिक गतिविधियां चल रही थीं। दरअसल, सरकार 2021 का नया मास्टर प्लान ले आई, जिसमें रिहाइश के लिए निर्दिष्ट इलाकों में वाणिज्यिक गतिविधि की इजाजत दी गई थी। लेकिन नए मास्टर प्लान के बावजूद, जिसने सीलिंग के आदेश के उद्देश्य को खत्मक रि दिया था, कोई ने इस तरह के इलाकों में भी सीलिंग जारी रखने को कहा, जहां वाणिज्यिक गतिविधि की इजाजत दी गई थी। हालांकि इन इलाकों में दुकान या ऑफिस के मालिकों ने हलफनामा दिया था कि 30 जून/30 सितम्बर 2006 तक अपनी वाणिज्यिक गतिविधि बंद कर देंगे, लेकिन कोर्ट का कहना था कि उन्हें अपने हल्फनामें के 'उल्लंघन' की इजाजत नहीं दी जा सकती।

कोर्ट के आदेशों से शहर में तबाही और आतंक मच गया। कोर्ट ने सीलिंग अभियान के निरीक्षण और निगरानी में अति उत्साह दिखाया, उस पर कइयों ने सवाल उठाए। एक लाख से अधिक दुकानें और वाणिज्यिक प्रतिष्ठान बंद कर दिए गए और उन्हें मजबूरन शॉपिंग मॉल और वाणिज्यिक परिसरों में जाना पड़ा। उधर, शॉपिंग मॉल और वाणिज्यिक परिसरों में दुकानाें और ऑफिसों की कीमतें रातोंरात दोगुनी-तिगुनी हो गईं। लिहाजा, कई लोगों ने सवाल उठाया कि क्या माल और वाणिज्यिक परिसर के डेवलपरों के फायदे के लिए एक अभियान शुरू किया गया? एक बात, जो सार्वजनिक तौर पर सामने आई, वह यह कि जिस समय न्यायमूर्ति सब्बरवाल सीलिंग के आदेश दे रहे थे, उनके बेटों चेतन और नितिन, जो छोटे आयात- निर्यात व्यवसायी थे, ने शॉपिंग माल और वाणिज्यिक परिसर के बड़े डेवलपरों के साथ साझेदारी की। इस तरह वे खुद बड़े वाणिज्यिक परिसर में डेवलपर बन गए।

कंपनी मामलों के विभाग में चेतन और नितिन सब्बरवाल ने जो दस्तावेज जमा किए हैं, उन्हें देखने से कई तथ्य सामने आते हैं। सन् 2004 तक सब्बरवाल भाइयों ने लाखें रुपए की आमदनीवाला आयात- निर्यात का छोटा व्यवसाय करते हुए पवन इम्पेक्स, सब्स एक्सपोर्ट्स और सुग एक्सपोर्ट्स नाम से तीन कंपनियां खड़ी की।

दिलचस्प बात यह है कि उनके पंजीकृत कार्यालय सब्बरवाल परिवार के घर 3/81 पंजाबी बाग में थे। जनवरी 2004 में उन्हें न्यायमूर्ति सब्बरवाल के सरकारी निवास 6 मोती लाल नेहरू मार्ग ले जाया गया। क्या यह महज संयोग था कि न्यायमूर्ति सब्बरवाल ने 7 मई 2004 को रिहायशी इलाकों के उन मकानों को सील करने का आदेश दिया था जहां दुकानें और ऑफिस चल रहे थे? जाहिर है, उनके आदेशों का कड़ाईसे पालन करने पर पंजाबी बाग स्थित उनका घर तो सील हो जाता, लेकिन उनके सरकारी निवास पर आंच नहीं आती।

बहरहाल, 23 अक्टूबर 2004 को शॉपिंग माल और वाणिज्यिक परिसरों के सबसे बड़े डेवलपरों में से एक के प्रोमोटर (बीपीटीपी ग्रुप के काबुल चावला) को 50 प्रतिशित शेयरधारक और निदेशक के रूप में पवन इम्पेक्स में शामिल कर लिया गया। उसी दिन पवन इम्पेक्स के पंजीकृत कार्यालय को 3/81 पंजाबी बागवापस ले जाया गया। इसके बाद, 12 फरवरी 2005 को काबुल चावला की पत्नी अंजलि चावला कोक भी निदेशक के रूप में कंपनी में शामिल कर लिया गया।

चेतन और नितिन ने वाणिज्यिक परिसरों के निर्माण के उद्देश्य से 8 अप्रैल 2005 को एक नई कंपनी हरपवन कंस्ट्रक्टर्स शुरू की। इसमें 25 अक्टूबर 2005 को दिल्ली के एक दूसरे बड़े बिल्डर पुरुषोत्तम बाघेरिया को साझीदार के रूप में शामिल किया गया। सब्बरवाल भाइयों के साथ साझीदारी करने के तुरंत बाद बाघेरिया ने साकेत में 'स्क्वायर 1 मॉल' बनाने की अपनी योजना का ऐलान किया। इसके दिल्ली के सबसे बड़े और लक्जरियस मॉल्स में से एक बताया गया।

फरवरी 2006 की 16 तारीख तक, जब मुख्य न्यायधीश सब्बरवाल ने दिल्ली के आवासीय इलाकों में चलने वाले वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों को सील करने के सख्त आदेश दिए; उनके बेटे मॉल और वाणिज्यिक परिसरों के व्यवसाय में प्रवेश करने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुके थे। उन्होंने दिल्ली के दो सबसे बड़े व्यावसायिक स्टेट डेवलपरों के साथ साझेदारी कर ली थी। इसके बाद सब्बरवाल भाइयों का यह व्यवसाय चल पड़ा। पवन इम्पेक्स की शेयर पूंजी 21 जून 2006 तक एक लाख रुपए से बढ़कर 3 करोड़ हो गई। इसके तुरंत बाद बीपीटीपी डेवपलर्स की चावला दंपति ने कंपनी में 1.5 करोड़ रुपए (50 प्रतिशत) का निवेश किया। पवन इम्पेक्स को 22 अगस्त 2006 को यूनियन बैंक आफ इंडिया की कनॉट प्लेस शाखा ने 28 करोड़ रुपए का ऋण दिया। यह ऋण नोएडा के सेक्टर 125 में प्लॉट संख्या-ए 3, 4 और 5 स्थित 'संयंत्र, मशीनरी और दूसरी संपत्ति' को बंधक रखकर लिया गया था, जबकि सच यह है कि वहां कोई संयंत्र या मशीनरी नहीं है। इसके विपरीत, वहां 5 लाख वर्ग फुट में करोड़ों की लागत से एक विशाल आईटी पार्क बनाया जा रहा है। इसके बारे में पूछे जाने पर बैंक के चेयरमैन ने बताया कि सब्बरवाल भाइयों ने 3 करोड़ की शेयर पूंजी, 7 करोड़ के अप्रतिभूत ऋण और 'संभावित खरीददारों से 18 करोड़ रुपए के अनुमानित मुनाफे' की प्रतिभूति के एवज में ऋण लिया। यदि हर बैंक संभावित खरीददारों से होने वाली अनुमानित आय के एवज में इतना उदार होकर ऋण देता तो हमारे पास लाखों करोड़ रुपए की गैर- निष्पादित परिसंपत्ति होती। दिलचस्प बात यह है कि नोएडा के एक महंगे सेक्टर में 12,000 वर्गमीटर के ये तीनों प्लॉट उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह यादव/अमर सिंह सरकार ने 29 दिसम्बर 2004 को पवन इम्पेक्स को मात्र 37,00 रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर पर आवंटित किए थे। उस समय वहां व्यावसायिक जमीन की दर कम से कम 30,000 रुपए प्रति वर्ग मीटर थी। यह अपने आप में कम से कम 30 करोड़ रुपए का उपहार है। नोएडा में सब्बरवाल भाइयों को केवल ये ही प्लाट आवंटित नहीं किए गए। सब्बरवाल भाइयों की दूसरी कंपनी सब्स एक्सपोर्ट्स को 10 नवम्बर 2006 को 4000 रुपए प्रति वर्गमीटर की दर पर सेक्टर 68 में प्लॉट नंबर 12ए आवंटित किया गया, जिसका क्षेत्रफल 12,000 वर्गमीटर था। (जबकि उस समय बाजार दर कम से कम दस गुना अधिक थी) इसका अर्थ सब्बरवाल भाइयों को चास करोड़ रुपए का का एक और उपहार। इसके पहले 6 नवंबर को सब्स एक्सपोर्ट्स को सेक्टर 63 में 800- 800 वर्ग मीटर के तीन प्लाट (सी 103, 104 और 105) 2100 रुपए प्रति वर्गमीटर की दर से आवंटित किए गए थे। उनके पास सेक्टर 8 में प्लॉट हैं। जहां उन्होंने हाल ही मे एक शानदार फैक्टरी और आफिस परिसर बनाया है। इसके अतिरिक्त, 2005 में न्यायमूर्ति सब्बरवाल की बीवी शीबा सब्बरवाल को सेक्टर 44 में एक आवासीय प्लॉट आवंटित किया गया। यह कुख्यात नोएडा आवंटन घोटाले का हिस्सा था। मीडिया ने इस घोटाले का पर्दाफाश किया कि तथाकथित ड्रॉ में ज्यादातर आवंटन अति महत्वपूर्ण लोगों को किया गया।
इस पर्दाफाश से परेशान उत्तर प्रदेश सरकार ने आवंटनों को रद्द कर दिया। यहां दिलचस्प बात यह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब आवंटनों की सीबीआई जांच के आदेश दिए तो सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बीपी सिंह ने उस पर तुरंत रोक लगा दी। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अमर सिंह से संबंधित कुख्यात टेपों के प्रकाशन पर न्यायमूर्ति सब्बरवाल ने खुद रोक लगा दी थी। इन टेपों में अमर सिंह को विभिन्न तरह के अपराधों में लिप्त दिखाया गया था।

इस तरह, 2004 तक छोटे आयात- निर्यात फर्मों के मालिक दोनों सब्बरवाल भाई सिर्फ दो वर्षों में वाणिज्यिक परिसर बनाने के व्यवसाय में चले गए और पैसे से खेलते दिख रहे हैं। यह फायदा उनेक बेटों और साझीदारों को हुआ। इस संदर्भ में यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सब्बरवाल के बेटों, चेतन और नितिन ने मार्च 2007 में पूर्व कानून मंत्री जगन्नाथ कौशल के उत्तराधिकारियों से 9 महारानी बाग स्थित 1,150 वर्ग गज का बंगला खरीदा। बताया गया कि उन्होंने इसके लिए 16 करोड़ रुपए दिए।

आखिरकार आयकर विभाग जागा और 28 मार्च 2007 को पवन इम्पेक्स को नोटिस भेजकर उसी व्यावसायिक गतिविधियों, खातों, संपत्ति, फंड के स्रोतों आदि का ब्यौरा मांगा, लेकिन मामला इससे ज्यादा गंभीर है। न्यायमूर्ति सब्बरवाल और उनके बेटे आयकर अधिनियम से परे अपराध और कदाचार में शामिल दिखते हैं। उनका सीलिंग के मामलों को सुनना और आदेश देना अनुचित था, क्योंकि इससेउनके बेटों को फायदा होना था। उनके आदेश जिसके मुताबिक कोई भी जज उस मामले को नहीं सुन सकता जिसमें उसकी निजी दिलचस्पी है। इन परिस्थितियों में इस मामले को उनका देखना भ्रष्टाचार निवारक कानून के तहत अपराध है या नहीं, बहस का मुद्दा है।
कुछ भी हो, मॉल और वाणिज्यिक परिसर डेवलपरों बीच के संबंधों की पूरी तरह जांच किए जाने की जरूरत है। खासतौर पर यह देखने के लिए कि उन्होंने किस तरह और किस हद तक सब्बरवाल भाइयों के व्यवसाय और संपत्ति की खरीद से पैसा लगाया। सब्बरवाल भाइयों की खरीदी समस्त संपत्ति की भी पूरी तरह जांच किए जाने की जरूरत है, जिससे यह पता लग सके कि उनका अधिग्रहण कानूनी रूप से सही है या नहीं। इसक अलावा, न्यायमूर्ति सब्बरवाल के बेटों की कंपनियों और उनके संबंधियों को आवंटित प्लॉओं की भी जांच की जानी चाहिए, ताकि यह मालूम हो सके कि आवंटन में उनका अनुचित पक्ष लिया गया कि नहीं? और यदि अनुचित पक्ष लिया गया तो इसके पीछे क्या उद्देश्य था? क्या किसी एवज में ऐसा किया गया?

हम इस तथ्य से वाकिफ हैं कि न्यायमूर्ति बहुत सक्षम जज थे जिन्होंने अपने कार्यकाल में कई मुद्दों पर अनुकरणीय फैसले दिए, लेकिन उन फैसलों के कारण वे उपरोक्त कदाचारों से दोषमुक्त नहीं हो सकते। इस मामले में जो तथ्य सामने आए हैं, उनसे हमारी उच्च न्यायपालिका की ईमानदारी शक के घेरे में आ गई है और लोगों का विश्वास डिगने लगा है। केवल पूरी पारदर्शिता के साथ जांच ही इस विश्वास को फिर से कायम कर सकती है।
साभार- प्रथम प्रवक्ता

देश के गद्दारों को पहिचान लो -डॉ. ब्रह्मदेव शर्मा

दो-तीन साल पहले एक खबर निकली थी कि पंजाब के एक गांव ने गांव की सीमा पर इश्तहार लगा दिया है कि 'यह गांव बिकाऊ है।' गांव के हर किसान पर इतना कर्ज हो गया था कि उसे चुकाना नामुमकिन हो गया था। इसीलिए इश्तहार लगाने की मजबूरी हो गई थी। पिछले दो साल में हवा इतनी बदली कि हरित क्रांति के महानायक पंजाब के पटियाला में संपन्न किसान पंचायत में दबे या मुखर स्वर में एक ही मन-मन की आवाज थी कि जमीन के पैसे किस तरकीब से ज्यादा से ज्यादा मिल सकते हैं? अपनी हेकड़ी के लिए मशहूर हरयाणा से भी वही 'मन की आवाज' सुनाई दे रही थी। 'काश, मेरे पास भी दो बीघा जमीन पैर रखने के लिए होती' की कोशिश न जाने कहां विलीन हो गई, किसी को पता भी नहीं चला। सरकारी सर्वे बताते हैं कि सौ में चालीस किसान कोई दूसरा धंधा करने के इच्छुक हैं। उधर नया करोड़पति - अरबपतियों का वर्ग औने-पौने जिधर देखो उधर जमीन पर अपना झंडा गाड़ता जा रहा है। कहीं कोई विरोध नहीं है! है भी तो आगे-पीछे वह 'कितना पैसा चाहिए? के सवाल में बदल जाता है। आज से उपरले 10 फीसदी लोगों के हाथ में पैसे की इतनी बड़ी ताकत हो गई है कि वह देश के जल, जंगल, जमीन के सभी संसाधनों को चुटकी मारते खरीद सकता है। आखिर पैसा है भी क्या- कागज की माया और उसका महाजाल। जमीन लो, कागज बनवा लो, बैंक के पास रख दो, और नोटों के कागज की गड्डियां झड़ने लगती हैं सो भुगतान कर दो। और वह पैसा भी तो घूम-फिर कर उन्हीं के पास आ जाना है, पुराने कर्ज की अदायगी, बेटी के ब्याह के लिए दहेज, असाध्य बीमारी की दवाई और तीमारदारी, मचलते बेटे की पढ़ाई और उसके नये शौक- टी.वी., मोटरसाइकिल- सीता माता की तरह जिस धरती से जन्मी थी हल को नोक के इशारे पर उसी में समा जाती है देखते-देखते। और किसान रूप राम धरती की मिट्टी में भाव विह्वल ढूढ़ते रह जाते हैं अपनी सीता को!

देख रही है पूरी अयोध्या इस दर्दनाक दृश्य को! होनी के सामने भला किस की चल सकती है? आज तक जो नहीं सुना जा रहा था, वह खुल कर सुनने में आ रहा है- अब किसान नहीं बचेगा। आज तक जो कथा- कहानियों की बातें थी वे सामने घटित हो रही हैं- जिस बाड़ को खेत की रखवाली के लिए बड़े जतन से बनाया वही बाड़ खेत को चरे डाल रही है। जिन सांसदों और विधायकों को अपने प्रतिनिधि के रूप में राजकाज चलाने के लिए भेजा था उन्होंने ऐसा राज चलाया कि उसमें आम आदमी के लिए कोई जगह ही नहीं है। संविधान में लिखा है -समानता होगी सो शुरूआती दौर के वे सभी कानून शिथिल कर दिए या खरिज कर दिये जिनसे गैर बराबरी पर अंकुश लगता। आज करोड़पतियों का राज है। संसद में 85 फीसदी सांसद करोड़पति हैं। कहां से आई यह अकूत संपदा? कोई पूछने वाला नहीं है।

पैसा पहले भी था कुछ लोगों के पास, परन्तु पैसे वाले का समाज में सम्मान नहीं था। पैसा पहले भी था परन्तु उस पैसे का कोई उपयोग नहीं था। विदेशों में ऐय्याशी की वस्तुओं का आयात नहीं हो सकता था। वातानुकूलति गाड़ियां नहीं बन सकती थी। पैसा पहले भी था, परन्तु उससे खेती की जमीनें नहीं खरीदी जा सकती थी। नियम और कानून पैसे की ताकत पर अंकुश थे। परन्तु देखते-देखते हमारे ही पहरेदारों ने उस पैसे की ताकत को खत्म करने वाले सब नियम औश्र कानून कचड़े की पेटी में फेंक दिए। 'सर्वे गुणा: कांचनमान्प्रयन्ति' ('सब गुणों का सोने में निवास है') का झंडा फहरा रहा है।
और अंत में राज्य किसका है? किसके साथ खड़ा है? के सवाल पर सब उलट-पलट गए। जमीन के मामले में पहले तो गुलामी के जमाने की राज्य की प्रभुसत्ता को आजादी के बाद भी उसी ताह कायम रखा। राज्य का अर्थ आम जन का प्रतिनिधि न होकर उन प्रतिनिधियों और उनके कारकुनों का राज्य हो गया। सो संसाधनों का मालिक उनसे अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले आम लोग न होकर शासन-तंत्र हो गया। पहले तो गुलामी के कानून भू- अर्जन अनिधियम के तहत मनमाने ढंग से लोगों की जमीन हड़प कर उद्योगपतियों को कौड़ी के मोल दे डाली। जब लोगों में इस बाबत कुछ जागरूकता आई और भूमि- अधिग्रहण करने के अधिकार पर ही सवालिया निशान लगाना शुरू की तो सरकारी लोगों ने ऐसी चाल चली जिसके सामने चाणक्य नीति तक शरमा जाए। कह दिया चलो अब इन मामलों में सरकार बीच में नहीं पड़ेगी, किसान और उद्योगपति आपस में लेनदेन का फैसला कर लें।

यहां आकर धूर्ता पर शरमा गई :
कैसा ऊंचा पांसा फेंका आम लोगों के प्रतिष्ठानों और उनके कारकुनों ने! सफाई से कह दिया चलो हमारे यानी सरकार के बीच पड़ने से एतराज है तो आपस में फैसलाकर लो। हमारा पूछना है कि आखिर राज्य किस मर्ज की दवा है? राज्य बीच से हट जाए तो क्या स्थिति बनती है- एक ओर किसान अकेला खड़ा है, दूसरी ओर पैसे की ताकत से लैस पूंजीपति। उस पैसे की ताकत से लैस है पूंजीपति जिस पर आज कहीं कोई अंकुश नहीं। जिसने खरीद डाला है सब जन प्रतिनिधियों को भी, अन्यथा धरती से उठने वाले आम लोगों के प्रतिनिधि करोड़पति कैसे हो गए? याद आती है सौ साल पहले हिंद स्वराज में अंग्रेजों की अपनी संसद के बारे में गांधी जी टिप्पणी थी- निपूती वेश्या। पैसे के बल पर वेश्या की तरह उसमें सब कुछ करवाया जा सकता है। सो किसान बनाम पूंजीपति में किसान और पूंजीपति एकल बगाल में हिस्सेदार नहीं है जिसमें बराबरी का जोड़ हो। पूंजीपति के पास पैसा है और पैसे से खरीदा गया पूरा प्रशासन तंत्र। यह प्रशासन तंत्र जन सेवक न होकर पूंजी सेवक है। यही नहीं, पैसे के बल पर रखा गया पूरा गुंडा तंत्र और भविष्य पर भरोसा दिलाया गया दिशाहीन युवा भी उसक इर्द-गिर्द मड़रा रहा है। दूसरी ओर किसान नितांत अकेला है। अरे और तो और लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार ने आज तक ग्राम सभा यानी गांव की सामान्य सभा को भी तो मान्यता नहीं दी है। ऐसे में अगर किसान आपस में मिलकर कोई बात करना चाहें या प्रतिरोध करना चाहें तो उसे कानून का उल्लंघन करार दिया जा सकता है। कहने का अर्थ है कि पूरी दुनिया एक और किसान नितांत एकाकी एक ओर। ऐसे में अगर जमीन के साथ उसकी लंगोटी भी न चली जाए तो निपट नंगा होकर दुनिया के खुले और भरे बाजार में घूमने के लिए न मजबूर हो जाए तो अपना भाग्य सराहे!

कहां है राजनीतिक दल
चलिए अकेले में नेता बिक गए, अकेले में प्रशसक बिक गए, परन्तु वह पूरा राजनीतिक तंत्र जिसे लोकतंत्र की आत्मा कहा जाता है, वह कहां है इस अभूतपूर्व घमासान में! कहने को सब किसानों के हिमायती हैं। सब उसे समर्थन देने का वायदा करके ही उसका वोट पाये हैं। सबसे अफसोस की बात यह है कि कोई भी राजनीतिक दल आज तक भारत में किसान खत्म होगा या होने के कगार पर पहुंच गया है इस बावत लोगों के बीच चर्चा करने की जरूरत नहीं समझ रहे हैं। मोटे तौर पर दलों को दो भागों में बांटा जाता है। एक पूंजीवादी व्यवस्था के समर्थक यानी दक्षिण पंथी। दूसरी ओर समाजवादी/साम्यवादी व्यवस्था के समर्थक यानी वामपंथी। वामपंथियों में यह माना जाता है कि समाजवाद के पहले एक ऐसा दौर आयेगा जिसमें पूंजीवादी व्यवस्था कायम होगी। उनका मानना है कि इस पूंजीवादी व्यवस्था में उसकी मृत्यु के बीज होते हैं। यानी एक ओर मुट्ठी भर पूंजीपति होंगे जो पूंजी के बल पर उत्पादन के सभी साधनों पर अपना कब्जा जमा लेंगे। दूसरी ओर होंगे अपना सब कुछ गंवाने वाला सर्वहारा वर्ग, जिसके पास पैर में बेड़ी के अलावा टूटने के लिए कुछ नहीं बच रहेगा। यह सर्वहारा इस अन्यायी व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह कर, उसके चकनाचूर कर देगी और सर्वहारा की एकाधिकारी व्यवस्था कायम होगी। वहां से समाजवादी और साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना की निष्कंटक राह होगी जिस पर मानव समाज आगे बढ़ेगा।

इस दक्षिण पंथियों और वाम पंथियों के सोच में अगले चरण में तो पूंजीवादी व्यवस्था का वर्चस्व होगा। उसमें पूंजी के बल पर वह सभी संसाधनों पर कब्जा कर लेगा। दक्षिण पंथियों के अनुसार वही सबसे तर्कपूर्ण और फायदेमंद व्यवस्था होगी। उसमें पूंजीपति सबके लिऐ बाजार के नियमों के अनुसार व्यवस्था करेगा। बाजार में अगर कामगारों की जरूरत नहीं है तो यह तो सिर्ग अनेक रूपों में उसका इंतजाम करेगी- बीमारी, महामारी, कुपोषण। दूसरा यह कि मानव समाज प्रजनन पर नियंत्रण करेगा। हमारे यहां भी तो दो या तीन बच्चों के बाद अब दो से अधिक नहीं की बात चल रही है। चीन में तो 'परिवार में एक बच्चा' की मान्यता क्रांति के तुरत बाद शुरू हो गई थी। जो घोर पूंजीवादी देश हैं उनमें से कुछ में जैसे फ्रांस में आबादी कम हो रही है और साधारण कामकाज के लिए उन्हें दूसरे देशों के नागरिकों को प्रवेश देने की मजबूरी है। इस तरह एक नया संतुलन कायम होगा, इसमें हाय तोबा की जरूरत नहीं है।

इस तरह दोनों ही विचारधाराओं में किसान का खात्मा और पूंजीवादी खेती को अनिवार्य माना गया है। यह इतिहास का नियम है, उसे बदला नहीं जा सकता है। आगे चर्चा के पहले यह जानना जरूरी होगा कि क्या कोई मध्यमार्गी विचारधारा भी है? सच पूछा जाय तो मध्यमार्ग में जो जोते उसकी जमीन पर आम सहमति दे रही हैं। इसी पर बात होती रही है, इसी के नारे लगते रहे हैं। दक्षिण पंथियों और वाम पंथियों ने भी इसमें हां में हां मिालई है क्योंकि इसके खिलाफ कहने का सासह नहीं जुटा पाए। दक्षिण पंथियों का विश्वास था कि ये आदर्शवादी नारे बहुत दिन चलेंगे नहीं और हार-थक कर लोग परिस्थिति से समझौता कर लेंगे। उधर पूंजी की ताकत का असर घटता जाएगा सो किसान अंत में अपनी मौत को स्वाभाविक मान लेगा। नारे चलते रहेंगे और पूंजीवाद की शोभायात्रा चलती रहेगी। आज हम उसी स्थिति में पहुंच गए हैं।

उधर वामपंथियों को -जो जोते उसकी जमीन- से कोई लेना-देना नहीं रहा। उन्हें मार्क्सवादी विवेचन पर पूरा भरोसा था और है। नारे लगाते रहो लेकिन यह समझ लो कि उनका कोई अर्थ नहीं है। किसानों के खैर- ख्वाह भी बने रहो और अंतिम रात कतल की रात का इंतजार करो। इस बीच ना मरने की किसान की पीड़ा हो रही है, उसमें हमदर्दी का इजहार करते रहो। बस!

राष्ट्रीय नीतियों पर विश्वबैंक का दुष्प्रभाव : स्वतंत्र न्यायाधिकरण का फैसला

न्यायाधिकरण में नहीं पहुंचे विश्व बैंक के अधिकारी
नई दिल्ली।(पीएनएन) विश्व बैंक के कार्यों पर हो रहे चार दिवसीय 'स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण में चौथे दिन न्यायाधीशों ने अपना फैसला सुनाया। न्यायाधिकरण में भारत में बैंक की नीतियों और बढ़ते हस्तक्षेप को लेकर कई आरोप लगाए गए। हालांकि विश्व बैंक के भारतीय कार्यालय ने स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण में शामिल होने का दावा किया था और यह भी कहा था कि वे बैंक के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे, लेकिन पर्याप्त समय और स्थान दिए जाने के बावजूद भी वे अपने दावे को सिध्द करने के लिए नहीं पहुंचे।

जन न्यायाधिकरण ने पाया कि भारतीय राष्ट्रीय नीतियों को बनाने में विश्व बैंक का प्रभाव नकारात्मक और असंगत रहा है। हालांकि भारत विश्व बैंक से सहायता प्राप्त करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार है। इस पर 1944 से अब तक 60 बिलियन डॉलर (2 लाख 40 हजार करोड़ रुपए) का कर्ज है। इस समय वार्षिक कर्ज देश के सकल घरेलू उत्पाद से एक फीसदी से भी कम है (नई योजनाओं के लिए 2005 में विश्व बैंक से लिया गया कर्ज जीडीपी का 0.45 फीसदी था)

इन कर्जों का प्रयोग महत्वपूर्ण नीतियों में बदलाव लाने और विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शर्तें मनवाने के लिए किया गया। इन क्षेत्रों में मुख्य रूप से प्रशासनिक सुधार, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी और पर्यावरण हैं, जिनका सामाजिक और राजनीतिक रूप से प्रतिकूल परिणाम भी रहा है। ये कर्ज एशियन विकास बैंक (एडीबी) और डिपार्टमेंट फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (डीएफआईडी) - यूके जैसे द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संस्थाओं से अतिरिक्त आर्थिक सहायता को वैधानिक रूप प्रदान करते हैं। विश्व बैंक से लिए गए कर्जे ने बहुत हद तक सामाजिक और पर्यावरणीय नुकसान किया है। इससे नर्मदा घाटी में पलायन से लेकर बड़वानी जैसे स्थानों पर परम्परागत मछुवारों की जीविका तक का नुकसान हुआ है।

न्यायाधिकरण ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि भारत के नीति निर्माण पर यह स्वेच्छाचारी प्रभाव विश्वबैंक के अपने ही रूल्स ऑफ एसोसिएशन का उल्लंघन करता है। जिसमें इसे एक अराजनीतिक संस्था का दर्जा दिया गया है और यह भी साफ तौर पर कहा गया है कि यह किसी भी सदस्य देश के राजनीतिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। न्यायाधिकरण में याचियों ने यह भी बात रखी कि भारत सरकार के वरिष्ठ पदों पर विश्व बैंक के पूर्व अधिकारियों की उपस्थिति अस्वीकार्य है, क्योंकि इसमें स्वार्थ शामिल हैं।

लोकतंत्र को खतरा
केरल स्टेट प्लानिंग बोर्ड के वाइस चेयरमैन प्रो. प्रभात पटनायक ने अपना पक्ष रखते हुए जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिनीवल मिशन (जेएनयूआरएम) का उदाहरण दिया, क्योंकि यह विश्व बैंक की ही एक योजना है। उन्होंने कहा कि केरल की जेएनयूआरएम योजना में राज्य सरकार पर दबाव डाला जा रहा था कि वह स्टाम्प डयूटी कम करने की शर्त स्वीकार करे। स्टाम्प डयूटी पहले 15 से 17 फीसदी तक थी, जिसे अब 5 फीसदी करने के लिए दबाव डाला जा रहा था। एक हजार करोड़ का कर्ज लेने के लिए केरल को सात हजार करोड़ रुपए के सरकारी राजस्व का घाटा उठाना पड़ेगा।

बंगलौर स्थित 'कोलबरेटिव फार द एडवांसमेंट ऑव द स्टडीज इन अर्बनिज्म' (सीएएसयूएमएम) के विनय बैंदूर ने इस बात के प्रमाण प्रस्तुत किए कि कैसे राज्य सरकार और उसकी अर्थव्यवस्था को 'कर्नाटक इकोनामिक रिस्ट्रक्चरिंग लोन' (केईआरएल) में बदलकर उसका कॉरपोरेटीकरण कर दिया गया। यानी कि अब यह निजी क्षेत्रों और इंटरप्राइज के विकास के लिए आर्थिक साधन जुटाता है। 250 मिलियन डॉलर के कर्ज के इतने दूरगामी परिणाम हुए कि सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण हो गया और स्वैछिक सेवानिवृत्ति का भुगतान लेने के लिए दो लाख स्थायी कर्मचारियों की कटौती करने के लिए दबाव डाला गया। इसके अलावा इस सबका प्रभाव किसानों की आत्महत्याओं के रूप में उभरा। ज्यादातर किसानों ने आत्महत्या इसलिए की कि वे बिजली का बिल नहीं चुका सकते थे, क्योंकि बिजली के रेट अचानक बढ़ा दिए गए थे।' खेती पर सब्सिडी घटा देने से लागतों में भी वृध्दि हो गई थी'।

जूरी के सदस्य और प्रसिध्द वैज्ञानिक मेहर इंजीनियर ने कहा कि उन्होंने इस सारे मुकदमें में यह पाया कि विश्व बैंक ने भारत पर अपनी बेकार तकनीकों को कैसे थोपा है। एक गहन शोध के बाद जो सबूत यहां रखे गए उनके मद्देनजर पर्यावरण क्षेत्र में विश्व बैंक की कल्पना करना भी कठिन है। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि बैंक अमीरों का, शहरों का समर्थक और पर्यावरण विरोधी है।

स्वतंत्र जन न्यायाधिकरण का आयोजन साठ से भी ज्यादा राष्ट्रीय और स्थानीय संगठनों ने मिलकर किया। इनमें मुख्य रूप से नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट (एनएपीएम), इंडियन सोशल एक्शन फोरम (इंसाफ), ह्यूमन राइट्स ला नेटवर्क, जेएनयू छात्रसंघ और टीचर एसोसिएशन, विभिन्न एक्टिविस और अकादमियों के सदस्य, नीति विश्लेषक और योजनाओं से प्रभावित समुदायों के लोग शामिल थे। जिन्होंने 21 से 24 सितम्बर तक 26 से भी ज्यादा क्षेत्रों में विश्व बैंक के खिलाफ साक्ष्य प्रस्तुत किए। जूरी सदस्यों में इतिहास विद् रोमिला थापर, लेखिका अरुंधति राय, सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय, सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायधीश पीवी सावंत, पूर्व वित्त सचिव एसपी शुक्ला, पूर्व जल सचिव रामास्वामी अय्यर, वैज्ञानिक मेहर इंजीनियर, अर्थशास्त्री अमित भादुड़ी, थाई आध्यात्मिक नेता सुलक्ष शिवरक्षा और मैक्सिको के अर्थशास्त्री एलियंद्रो नडाल शामिल थे।

विश्व बैंक और भारत सरकार कार्यवाही से नदारद
आरोपों के जवाब में विश्व बैंक ने इंडिया होम पेज पर फ-। दस्तावेज भेजा है। इस दस्तावेज में बैंक ने जो दावा किया है वह चौंकाने वाला है। ' विश्व बैंक ने निश्चित रूप से भारत में जल आपूर्ति सेवाओं के निजीकरण्ा की कभी भी सिफारिश नहीं की।' न्यायाधिकरण से यह अपेक्षा की गई है कि वह बैंक को एक विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करेगा। भारत सरकार विश्व बैंक के संदर्भ में अपना एक प्रतिनिधि भी भेजने में असफल रही। हालांकि सभी मंत्रालयों (जो विश्व बैंक से पैसा उधार लेते हैं) के बहुत से सरकारी अधिकारियों को दो सप्ताह पहले ही ई-मेल और फैक्स भेज दिए गए थे।

बिजली के निजीकरण के लिए दबाव
1990 के दशक में विश्व बैंक से लिए हुए कर्जे का बीस से तीस फीसदी भारत में ऊर्जा क्षेत्र पर लगाया गया। ऊर्जा क्षेत्र के पुनर्निर्माण के लिए विश्व बैंक से कर्ज लेने वालों में उड़ीसा पहला राज्य था। पूणे स्थित प्रयास एनर्जी ग्रुप के श्रीकुमार एन ने तर्क रखा कि विश्व बैंक की सलाह के अनुसार चलने के कारण उड़ीसा ने स्थानीय विशेषज्ञों को नजरअंदाज कर दिया और विदेशी सलाहकारों पर 306 करोड़ रुपए खर्च किए। इन सलाहकार एजेंसियों ने ही पानी के वितरण का निजीकरण करने की सिफारिश की थी और अमेरिकन फर्म 'एईएस' ने केंद्रीय क्षेत्र में पानी के वितरण का काम अपने हाथ में लिया था और 2001 में राज्य छोड़ दिया।

बैंक का उपनिवेशवाद
चेन्नई स्थित कॉरपोरेट एकाउंटबिलिटी डेस्क से नित्यानंद जया रामन ने जूरी के सामने अपनी बात रखते हुए कहा कि 'बैंक पैसे और बेकार तकनीकी का लालच देकर उपनिवेशवाद को बढ़ावा दे रहा है।' उन्होंने कई ऐसे मामलों के साक्ष्य प्रस्तुत किए जहां बैंक ने 88 से भी ज्यादा 'कॉमन एफलूएंट ट्रीटमेंट प्लांट' लगाने पर जोर दिया, जिनमें से 'सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड' द्वारा नब्बे फीसदी से भी ज्यादा ऐसे प्लांट पाए गए जो पर्यावरणीय मानकों पर खरे नहीं उतरते थे।

यह शुरुआत है
इंसाफ के जनरल सेक्रेटरी विल्फ्रेड डि' कॉस्टा ने कहा कि न्यायाधिकरण काफी उपयोगी साबित हुआ है, क्योंकि इसने सामाजिक आंदोलनों, संगठनों, शोधकर्ताओं, अकादमियों के सदस्यों और देश के विभिन्न भागों में जुटे हुए संघर्ष के संगठनों को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है। हमारा अगला कदम होगा कि हम इस मंच का उपयोग नव उदारवाद के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष पर आधारित एक बड़ी लड़ाई के लिए करें और एक ऐसे भारत के निर्माण के लिए काम करें जहां विश्व बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक जैसी संस्थाएं न हों।

पांव पसारता भ्रष्टाचार: संजय कपूर

केरल व कर्नाटक के महिला सरपंचों के एक संगठन द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में कुछ रोचक तथ्य सामने आए हैं. कुछ लोगों का यह विचार था कि महिला सरपंचों का नजरिया भ्रष्टाचार के विरुद्ध है तथा वे सरकार के कार्यक्रमों को पूरी तरह से लागू करती हैं. सर्वेक्षण में यह बात गलत साबित हुई तथा यह तथ्य सामने आया है कि महिलाएं भी धनलोलुप हैं. यदि हम इन सर्वेक्षणों को किनारे रख दें तो भी हम पाएंगे कि महिला और पुरुष सरपंचों में कोई खास अंतर नहीं है.


यह अध्ययन इसको नकारता है कि महिलाओं को संसद या विधानसभाओं में जाने और सत्ता में अधिक भागीदारी मिलने पर भ्रष्टाचार में कमी आएगी, जिसको आधार बनाकर महिला संगठन उनके लिए ३३ फीसदी आरक्षण की मांग कर रही हैं.

वास्तव में इसे साबित करने के लिए दक्षिण भारत के गांवों में इसके सर्वेक्षण की कोई आवश्यकता नहीं थी. अगर हम वर्तमान परिदृश्य पर नजर डालें तो कुछ महिला नेताओं जैसे तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता और बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती, दोनों के मामले में यह कहा जा सकता है कि महिलाएं भी उतना ही भ्रष्टाचार में लिप्त हैं जितना कि पुरुष.

भारत में यह प्रचलन हो गया है कि किसी भी काम के लिए हमें सुविधा शुल्क देना पड़ता है. यह स्पीड मनी होता है और यदि आप सुविधा शुल्क नहीं देंगे तो आप कोई भी काम नहीं करा सकते. देश की लचर कानून ब्यवस्था का नौकरशाह व राजनीतिज्ञ भरपूर लाभ उठाते हैं लेकिन आम आदमी को कोई भी काम कराने के लिए सुविधा शुल्क का सहारा लेना पड़ता है. मृत्यु या जन्म प्रमाणपत्र लेना हो, या फिर भीड़ भरी ट्रेन में सीट, हमें सुविधा शुल्क देना पड़ता है.

एक अनुमान के अनुसार अपना काम कराने के लिए लोग लगभग १ ट्रीलियन डालर का भुगतान करते हैं जबकि यहां एक अरब लोग रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. यहां तो जीने के लिए भी लोगों को सुविधा शुल्क देने की आवश्यकता पड़ रही है. जब भ्रष्टाचार ऊंचे स्थानों पर होता है और उसमें रक्षा व उड़ानों से संबंधित सौदे होते हैं तो उसके कुछ और ही मायने होते हैं.

राजनीतिज्ञों के लिए सुविधा शुल्क अपने मतदाताओं की देखभाल करने व मुख्य रूप से चुनाव लड़ने के काम आता है. विचारधारा के क्षरण के साथ ही चुनाव काफी खर्चीले हो गए हैं. एक सामान्य सर्वेक्षण के अनुसार प्रत्येक सांसद चुनावों में चुनाव आयोग द्वारा तय की गई अधिकतम धनराशि २० लाख से काफी अधिक खर्च करते हैं. एक अनुमान के अनुसार यह आंकड़ा पांच करोड़ से ज्यादा का है. यह आश्चर्य की बात है कि सांसदों के पास इतने पैसे कहां से आते हैं?

पूरे देश को आश्चर्यचकित कर देने वाले जैन हवाला घोटाले की जांच के दौरान एक बहुत अमीर आरोपी से पूछा गया कि वह इतने थोड़े पैसों के लिए ऐसा क्यों किया तो उसका जवाब था कि "राजनीति में किसी भी काम के लिए प्रत्येक समय पैसों की जरुरत होती है और उनके पास पैसे कमाने का कोई पारदर्शी तरीका नहीं होता है". अधिकतर राजनीतिज्ञ व कुछ बड़े वकील राजनीति के अलावा कुछ भी नहीं करते. चुनावों के समय अपने धन का लेखा जोखा प्रस्तुत करने के बाद भी बहुत से राजनीतिज्ञों की आय का स्रोत नहीं पता होता है. आयकर विभाग को इस बारे में गहन छानबीन करनी चाहिए.

केवल राजनीतिज्ञों पर ही दोषारोपण क्यों करें. कुछ पब्लिक सर्वेंट जो भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, उनमें से अधिकतर नए भारत के प्रतिमान हैं जो वायुयान और बीएमडब्ल्यू कारों पर सवारी करते हैं लेकिन उनकी छवि अच्छी नहीं होती. अपने लाभ के सामने उनके लिए नियम कानून कोई मायने नहीं रखता और वे कर भी अदा नहीं करते. यहां तक की उनमें से अधिकतर आर्थिक सुधारों का लाभ भी उठाते हैं.

ऐसे माहौल में जहां सभी कुछ या तो गैरकानूनी है या अवैध तरीके से प्राप्त किया जा रहा है, ऐसे में नियम कानून की बात करना बेमानी हो गया है. नियम कानून का पालन करने वाले लोग भी जब यह देखते हैं कि भ्रष्टाचारी फल फूल रहे हैं तो वे भी इस दबाव के आगे झुक जाते हैं. इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि भारत में अधिकतर निर्माण अवैधानिक हैं और जब भी कुछ अवैध निर्माणों पर बुल्डोजर चलाया जाता है तो इसे अत्याचार के तौर पर लिया जाता है. बुल्डोजर का सामना कर रहे लोगों के अनुसार "हमने एमसीडी अधिकारियों को इसके लिए पैसे दिए हैं, हमने बिजली और पानी का पैसा दिया है, हमें कभी यह नहीं लगा कि हम गलत कर रहे हैं".

वे आश्चर्यचकित होते हैं कि क्यों सरकार और न्यायालय सैनिक फार्म में स्थित राजनीतिज्ञों के निवासों को ढ़हाने नहीं देते जबकि वे भी उसी तरह अवैध हैं. यदि सरकार भूमि कानून को सरल बना दे तो दिल्ली में चल रहा तोड़फोड़ भ्रष्टाचार के खिलाफ उठाया गया एक अच्छा कदम है.

यदि केंद्रीय सूचना आयोग के अधिकारी अपने भूत को त्याग दें और लोगों को सब कुछ जानने के अधिकार पर अमल करें तो सूचना का अधिकार इस दिशा में एक प्रभावी कदम साबित होगा. सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए योग्य लोग ही ऊंचे पदों पर बैठें. पूंजीपतियों और नौकरशाहों को सजा का भागीदार बनाने से यह संदेश जाएगा कि भ्रष्टाचार कम खतरनाक और अधिक निवेश का उद्यम नहीं है. संयुक्त राष्ट्र में भ्रष्टाचार रोकने के समझौते पर भारत के हस्ताक्षर करने के निर्णय के कारण भारत की छवि और अधिक स्पष्ट हुई है और आने वाले दिनों में इसका प्रभाव दिखाई देगा.
प्रधानमंत्री का यह सुझाव कि सरकार को चुनाव के खर्चे खुद उठाने चाहिए, शुरुआती दौर में यह अच्छा प्रयास है. स्टिंग आपरेशन में दोषी व सदन की गरिमा को धूमिल कर रहे सांसदों को संसद द्वारा उनकी सदस्यता समाप्त किया जाना एक अच्छा उदाहरण है. नए वैश्विक नियम के अनुसार भ्रष्टाचार को अंतरराष्ट्रीय अपराध मानते हुए राष्ट्रों को यह अधिकार दिया है कि वे उन कंपनियों के खिलाफ कारवाई कर सकते हैं जो उनकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएंगी या सुविधा शुल्क देकर ठेके प्राप्त करेंगी. यदि ऐसा होता है तो भ्रष्टाचार के प्रति लोगों का नजरिया बदलेगा. सामान्य कार्यों जैसे कि ड्राईविंग लाईसेंस या गृह लोन लेने के लिए सुविधा शुल्क नहीं देना होगा. जब तक ऐसा नहीं हो जाता तब तक सामान्य आदमी को सुविधा शुल्क देना होगा क्योंकि उन्हें जिंदा रहना है.
साभार- हार्डन्यूज

विश्व एजेंडे में तिब्बत भी हो शामिल - हर्ष डोभाल

आज सैनिक और कूटनीतिक कार्यवाहियां विश्व के सामने एक अहम चुनौती बनी हुई हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों ने तिब्बत के मुद्दे को बड़ी समस्या की सूची से निकाल दिया है, जहां अफगानिस्तान, फिलीस्तीन, ईराक, लेबनान और अन्य संघर्षरत क्षेत्रों पर ध्यान लगाया गया है, वहीं तिब्बत की समस्या को हल करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं, जबकि चीन स्थानीय लोगों को चूहों की तरह मसल रहा है, फिर भी दुनिया के किसी कोने से विरोध के स्वर या समर्थन के स्वर उठते सुनाई नहीं दे रहे हैं। यहां तक कि भारत भी अपने द्वार पर खड़े उपनिवेश को देखकर भी आंखें मूंद रहा है और भारत और चीन के बीच खड़े तिब्बत के स्ट्रेटेजिक महत्व तक को भूल गया है कि तिब्बत दो एशियाई शक्तियों के बीच सुरक्षा क्षेत्र (बफर स्टेट) की भूमिका निभा रहा है। क्या संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के पास तिब्बत के लिए कोई वास्तविक प्रस्ताव नहीं है? पिछले 50 सालों से चली आ रही तिब्बत की इस समस्या को हल करने के लिए न तो कोई ठोस कदम उठाए गए हैं और न ही कोई ठोस उपाय सोचा गया है। हालांकि पश्चिम ने थोड़ी बहुत रुचि दिखाई है, लेकिन अमरीका और यूरोप ने भी तिब्बतियों को नजर अंदाज कर उन्हें उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया है। जिराल्ड फोर्ड के बाद रिचार्ड निक्सन के सत्ता संभालते ही सीआईए ने तिब्बती गुरिल्लाओं से अपना समर्थन वापिस ले लिया, क्योंकि अमरीकी गिध्ददृष्टि चीनी उद्योगों और निवेश अवसरों पर लगी हुई थी।

चीन ने 1949 में तिब्बतियों को हरा दिया था और 1959 में दलाई लामा देश छोड़कर भाग गए, तब से तिब्बतियों के ऊपर लाल चीन-तानाशाही का भयानक साया आज तक बना हुआ है। मानवाधिकार संस्थाओं की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों से चीन के सैनिक अधिकारियों ने तिब्बत में आतंक फैला रखा है, चीनी जेलों और श्रमिक कैम्पों में हजारों- लाखों तिब्बतियों ने दम तोड़ दिया है। दलाई लामा की तस्वीर तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, विद्यालयों में तिब्बती भाषा बंद कर दी गई है, भिक्षुओं को गिरफ्तार कर कष्ट दिया जाता है, संपन्न परिवेश को नष्ट कर दिया गया है और तिब्बत को पूरी तरह चीन में मिलाने के लिए बिछाई गई नई रेल लाइनों और सड़कों के जरिए गैर तिब्बती चीनियों को उस क्षेत्र में बसाया जा रहा है।
इतना ही नहीं इस झूठ का जोर-शोर से प्रचार हो रहा है कि तिब्बत के लोग चीन के साथ मिलने के लिए न केवल आतुर हैं, बल्कि इस फैसले से खुश भी हैं। सच तो यह है कि तिब्बतियों को सारी दुनिया ने नजर अंदाज कर दिया है। जिन्हें चीन ने न केवल उनकी ही मातृभूमि से बेदखल कर दिया है, उनकी आवाज तक छीन ली है, जिससे वे खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।

तिब्बतियों की अपनी भाषा, इतिहास, परम्पराएं, संस्कृति, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगीत हैं। हालांकि तिब्बतियों को पूरा अधिकार है कि वे अपनी आजादी और शांतिपूर्ण अस्तित्व के लिए संघर्ष करें, फिर भी उन्होंने अहिंसा का रास्ता अपनाया है। बेघर होकर भी तिब्बती सरकार हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से ही चीनी सरकार के साथ दशकों से बातचीत करने की कोशिश कर रही है, इन सालों में कई प्रयास किए गए हैं लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं निकला है। यहां तक कि चीनी शक्तियां अब इतना कड़ा रुख अपना रही हैं कि उन्होंने दलाई लामा के चीनी नियंत्रण वाली तिब्बती सत्ता के प्रस्ताव तक को ठुकरा दिया है।

अब चूंकि चीन, खासतौर पर पश्चिम के लिए एक बड़े बाजार के रूप में उभर रहा है, और अगले ओलम्पिक की मेजबानी कर रहा है, तो ऐसे समय में अंतर्राष्ट्रीय समुदायों को तिब्बत के लोगों, मानव अधिकार उल्लंघन, उत्पीड़न, मनमानी गिरफ्तारियों, हजारों प्राचीन मठों और सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत के नुकसान के हजारों मामलों को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह संपूर्ण मानवता से जुड़ा मुद्दा है। भारत, नेपाल और दूसरे देशों में बसने वाले शरणार्थी, अपनी आजादी, दर्द और पीड़ा के संघर्ष में अपनी जमीन और शांति को वापिस पाने के लिये पूरे विश्व से सहायता की गुहार लगा रहे हैं, जो कुछ दिखाई दे रहा है, असलियत में तिब्बत में उससे कहीं ज्यादा हो रहा है। 1789 में हुए त्याननमान चौक हत्याकांड ने पूरे विश्व को दहला कर रख दिया था जब चीन ने कम्यूनिस्ट शासन के बजाय प्रजातंत्र की मांग करने वाले युवकों की बड़ी ही निर्दयता से हत्याएं करा दी थीं। इन विद्यार्थियों को शत्रु कहकर, संगीनों की छाया में मौत के घाट उतार दिया गया था। फिर भी दुनिया ने यह नहीं सोचा कि पिछले पचास सालों से तिब्बत उसी चीनी शासन के हाथों सताया जा रहा है।

इन सबके प्रति विश्व जितना उदासीन रहेगा, चीन उतना ही अन्यायी होता जाएगा, जिसका सामना न केवल तिब्बत के लोगों को करना पड़ेगा, बल्कि उन सभी को करना होगा जो लाल झंडे के नीचे बीजिंग में बैठे लोगों से कुछ अलग सोच रखते हैं, क्योंकि यह लाल झंडा ही उन्हें यह अधिकार देता है कि वे जिसे चाहे, वर्ग का दुश्मन घोषित कर दें। सच तो यह है कि एक पूर्वी उपनिवेशवादी ताकत चीन, अपने साम्यवादी रूप को खत्म करके, बाजार दबावों को अपनाकर, नवउदारीकरण की नीतियों से, विश्व की छत को ही कुचल रहा है।

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