विश्व एजेंडे में तिब्बत भी हो शामिल - हर्ष डोभाल

आज सैनिक और कूटनीतिक कार्यवाहियां विश्व के सामने एक अहम चुनौती बनी हुई हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों ने तिब्बत के मुद्दे को बड़ी समस्या की सूची से निकाल दिया है, जहां अफगानिस्तान, फिलीस्तीन, ईराक, लेबनान और अन्य संघर्षरत क्षेत्रों पर ध्यान लगाया गया है, वहीं तिब्बत की समस्या को हल करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं, जबकि चीन स्थानीय लोगों को चूहों की तरह मसल रहा है, फिर भी दुनिया के किसी कोने से विरोध के स्वर या समर्थन के स्वर उठते सुनाई नहीं दे रहे हैं। यहां तक कि भारत भी अपने द्वार पर खड़े उपनिवेश को देखकर भी आंखें मूंद रहा है और भारत और चीन के बीच खड़े तिब्बत के स्ट्रेटेजिक महत्व तक को भूल गया है कि तिब्बत दो एशियाई शक्तियों के बीच सुरक्षा क्षेत्र (बफर स्टेट) की भूमिका निभा रहा है। क्या संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के पास तिब्बत के लिए कोई वास्तविक प्रस्ताव नहीं है? पिछले 50 सालों से चली आ रही तिब्बत की इस समस्या को हल करने के लिए न तो कोई ठोस कदम उठाए गए हैं और न ही कोई ठोस उपाय सोचा गया है। हालांकि पश्चिम ने थोड़ी बहुत रुचि दिखाई है, लेकिन अमरीका और यूरोप ने भी तिब्बतियों को नजर अंदाज कर उन्हें उनके भाग्य के भरोसे छोड़ दिया है। जिराल्ड फोर्ड के बाद रिचार्ड निक्सन के सत्ता संभालते ही सीआईए ने तिब्बती गुरिल्लाओं से अपना समर्थन वापिस ले लिया, क्योंकि अमरीकी गिध्ददृष्टि चीनी उद्योगों और निवेश अवसरों पर लगी हुई थी।

चीन ने 1949 में तिब्बतियों को हरा दिया था और 1959 में दलाई लामा देश छोड़कर भाग गए, तब से तिब्बतियों के ऊपर लाल चीन-तानाशाही का भयानक साया आज तक बना हुआ है। मानवाधिकार संस्थाओं की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों से चीन के सैनिक अधिकारियों ने तिब्बत में आतंक फैला रखा है, चीनी जेलों और श्रमिक कैम्पों में हजारों- लाखों तिब्बतियों ने दम तोड़ दिया है। दलाई लामा की तस्वीर तक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, विद्यालयों में तिब्बती भाषा बंद कर दी गई है, भिक्षुओं को गिरफ्तार कर कष्ट दिया जाता है, संपन्न परिवेश को नष्ट कर दिया गया है और तिब्बत को पूरी तरह चीन में मिलाने के लिए बिछाई गई नई रेल लाइनों और सड़कों के जरिए गैर तिब्बती चीनियों को उस क्षेत्र में बसाया जा रहा है।
इतना ही नहीं इस झूठ का जोर-शोर से प्रचार हो रहा है कि तिब्बत के लोग चीन के साथ मिलने के लिए न केवल आतुर हैं, बल्कि इस फैसले से खुश भी हैं। सच तो यह है कि तिब्बतियों को सारी दुनिया ने नजर अंदाज कर दिया है। जिन्हें चीन ने न केवल उनकी ही मातृभूमि से बेदखल कर दिया है, उनकी आवाज तक छीन ली है, जिससे वे खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।

तिब्बतियों की अपनी भाषा, इतिहास, परम्पराएं, संस्कृति, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगीत हैं। हालांकि तिब्बतियों को पूरा अधिकार है कि वे अपनी आजादी और शांतिपूर्ण अस्तित्व के लिए संघर्ष करें, फिर भी उन्होंने अहिंसा का रास्ता अपनाया है। बेघर होकर भी तिब्बती सरकार हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से ही चीनी सरकार के साथ दशकों से बातचीत करने की कोशिश कर रही है, इन सालों में कई प्रयास किए गए हैं लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं निकला है। यहां तक कि चीनी शक्तियां अब इतना कड़ा रुख अपना रही हैं कि उन्होंने दलाई लामा के चीनी नियंत्रण वाली तिब्बती सत्ता के प्रस्ताव तक को ठुकरा दिया है।

अब चूंकि चीन, खासतौर पर पश्चिम के लिए एक बड़े बाजार के रूप में उभर रहा है, और अगले ओलम्पिक की मेजबानी कर रहा है, तो ऐसे समय में अंतर्राष्ट्रीय समुदायों को तिब्बत के लोगों, मानव अधिकार उल्लंघन, उत्पीड़न, मनमानी गिरफ्तारियों, हजारों प्राचीन मठों और सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत के नुकसान के हजारों मामलों को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह संपूर्ण मानवता से जुड़ा मुद्दा है। भारत, नेपाल और दूसरे देशों में बसने वाले शरणार्थी, अपनी आजादी, दर्द और पीड़ा के संघर्ष में अपनी जमीन और शांति को वापिस पाने के लिये पूरे विश्व से सहायता की गुहार लगा रहे हैं, जो कुछ दिखाई दे रहा है, असलियत में तिब्बत में उससे कहीं ज्यादा हो रहा है। 1789 में हुए त्याननमान चौक हत्याकांड ने पूरे विश्व को दहला कर रख दिया था जब चीन ने कम्यूनिस्ट शासन के बजाय प्रजातंत्र की मांग करने वाले युवकों की बड़ी ही निर्दयता से हत्याएं करा दी थीं। इन विद्यार्थियों को शत्रु कहकर, संगीनों की छाया में मौत के घाट उतार दिया गया था। फिर भी दुनिया ने यह नहीं सोचा कि पिछले पचास सालों से तिब्बत उसी चीनी शासन के हाथों सताया जा रहा है।

इन सबके प्रति विश्व जितना उदासीन रहेगा, चीन उतना ही अन्यायी होता जाएगा, जिसका सामना न केवल तिब्बत के लोगों को करना पड़ेगा, बल्कि उन सभी को करना होगा जो लाल झंडे के नीचे बीजिंग में बैठे लोगों से कुछ अलग सोच रखते हैं, क्योंकि यह लाल झंडा ही उन्हें यह अधिकार देता है कि वे जिसे चाहे, वर्ग का दुश्मन घोषित कर दें। सच तो यह है कि एक पूर्वी उपनिवेशवादी ताकत चीन, अपने साम्यवादी रूप को खत्म करके, बाजार दबावों को अपनाकर, नवउदारीकरण की नीतियों से, विश्व की छत को ही कुचल रहा है।

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