संदर्भ- भारत-अमेरिकी परमाणु समझौता : कस्तूरी कुण्डलि बसै, मृग ढूँढ़त वन माँहि -डॉ. बनवारी लाल शर्मा

भारत की बढ़ती ऊर्जा की मांग को देखकर यह पुरानी ज्ञानोक्ति याद आ गयी। कस्तूरी हिरन को सुगन्ध से पता चल जाता है कि कस्तूरी कहीं है, पर वह उसे सारे जंगल में खोजता हुआ भागता रहता है, उसके संज्ञान में यह बात नहीं आती कि कस्तूरी उसकी नाभि के अन्दर रखी हुई है। भारत सरकार ऊर्जा के लिए अमरीका के दरवाजे पर खड़ी है इस उम्मीद में कि वहाँ से न्यूक्लियर ईधन और तकनीकी मिल जाय, जिससे देश में 30 न्यूक्लियर बिजली के कारखाने खड़े किये जा सकें। ऊर्जा के लिए उसे ईरान से वार्ता करनी पड़ रही है, पाकिस्तान को भी मनाना पड़ रहा है इसलिए कि ईरान की गैस पाकिस्तान में होती हुई पाइप लाइन से भारत पहुँच सके। इस सारे भटकाव में भारत भूल गया है कि उसके पास खुद ऊर्जा के भण्डार भरे हैं।

मामला अमरीका से न्यूक्लियर समझौते का
भारत ऊर्जा इकट्ठा करने के लिए कैसे भटक रहा है, पहले इसकी चर्चा कर लें। 18 जुलाई 2005 को अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश और भारत के नागरिक ऊर्जा सहयोग और व्यापार का प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के बीच वार्ता में सौदा हुआ कि जिसके तहत भारत अमरीका से परमाणु बिजली बनाने के लिए यूरेनियम न्यूक्लियर टैक्नौलोजी और मशीनरी खरीद सकेगा जिससे वह देश की बिजली की बढ़ती जरूरत को पूरा करने के लिए 30 पावर प्लांट लगायेगा। 2 मार्च 2006 को अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान एक विभाजन योजना बनी जिसके तहत भारत को न्यूक्लियर रिएक्टर के पूरे जीवन काल के लिए ईंधन आपूर्ति का अश्वासन दिया गया, साथ ही न्यूक्लियर ईंधन का एक स्त्रातजिक भंडार बनाने का तय हुआ जिससे ईंधन की आपूर्ति में कोई बाधा आने पर इस भंडार से आपूर्ति की जा सके। इसके बदले में भारत ने अपने नागरिक रिएक्टरों को अन्तरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की भारत विशेष सुरक्षा के अधीन सदैव के लिए रख दिया। इस सौदा के लिए अमरीका को संसद के दोनो भवनों-सिनेट और प्रतिनिधि सदन से एक्ट बनवाना पड़ा है जिसे हाइड एक्ट या एक्ट 123 कहा गया है।


इस एक्ट में कुछ ऐसे प्रावधान भी जोड़े गये हैं जो बुश-मनमोहन समझौते में नहीं थे, या समझौते के प्रतिकूल पड़ते हैं। दरअसल भारत के कई चोटी के वैज्ञानिक, जिनमें परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष भी शामिल हैं, तथा कई सामाजिक संगठन इस समझौते का विरोध करते रहे हैं। इन वैज्ञानिकों का कहना है कि अमरीका पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए और भारत परमाणु परीक्षण के करने अधिकार से किसी कीमत पर भी समझौता न करे, भले ही वह ऐसा परीक्षण कभी भी न करे। उनका यह भी कहना है कि भारत में थोरियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है और थोरियम से बिजली बनाने की टैक्नोलोजी भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित कर ली है। फिर क्या जरूरत है अमरीका से यूरेनियम और उससे बिजली बनाने की महँगी टैक्नोलोजी खरीदने की और अमरीकी शर्तें मानने की और परावलम्बी बनने की। खैर! भारत सरकार अमरीका से सौदा करने पर तुली हुई है। परन्तु इसमें भारी अड़ंगे हैं। इनमें प्रमुख रुकावटें ये हैं :


(1) वापसी का अधिकार : हाइड एक्ट में यह प्रावधान है कि यदि भारत परमाणु परीक्षण करता है (हालाँकि यह बात घुमा-फिरा कर लिखी गयी है) तो चालू समझौता समाप्त कर दिया जायेगा और भारत को आयात किया गया ईंधन, टैक्नौलोजी, मशीनरी और न्यूक्लियर ईंधन का भंडार और जला ईंधन वापस करना होगा। यह प्रावधान पूरे जीवनकाल के लिए न्यूक्लियर ईंधन आपूर्ति की अमरीका द्वारा दिये गये आश्वासन का उल्लंघन करता है। दरअसल 18 जुलाई 2005 के समझौते में भारत ने परमाणु परीक्षण न करने की अपनी राजनैतिक निष्ठा प्रकट की थी। हाइड एक इस राजनैतिक निष्ठा को द्विपक्षीय कानूनी व्यवस्था में बदलना चाहता है जो भारत को मंजूर नहीं है।


(2) विभाजन योजना : इस योजना के तहत भारत को अपने न्यूक्लियर कार्यक्रमों को दो हिस्सों में बांटना था, नागरिक और सैनिक। सारी सहायता केवल नागरिक अपने गैर-नागरिक न्यूक्लियर कार्यक्रम से ईंधन नागरिक न्यूक्लियर कार्यक्रमों के लिए मिलेगी। होगा यह कि भारत का गैर नागरिक न्यूक्लियर पर कार्यक्रम कमजोर पड़ता जायेगा। इस प्रकार भारत हमेशा अमरीका के दबाव में रहेगा अपनी विदेशी नीति के मामले में।
(3) जले ईंधन की रिप्रोसेसिंग : न्यूक्लियर प्लांटों में इस्तेमाल किये हुए ईंधन को भारत फिर से रिप्रोसेस करके किसी और काम में इस्तेमाल कर ले, यह अमरीका को नामंजूर है।

पिछले महीने (अप्रैल) में केपटाउन में भारत और अमरीका के अधिकारियों के बीच इन विवादों को सुलझाने के लिए वार्ता हुई पर कोई खास नतीजा नहीं निकला। इधर भारत ने ईरान के साथ गैस खरीदने का 22 अरब डॉलर का सौदा जून 2005 में कर रखा है जिसके तहत द्रवित प्राकृतिक गैस भारत आयेगी। यह गैस पाइपलाइन से पाकिस्तान होती हुई आयेगी। पाकिस्तान भी इस समझौते में भागीदार है। इस गैस का सौदा हुआ था एक मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट ;डठज्न्ध्द का 3.215 डॉलर कीमत पर। पर इस बीच भारत ने अमरीकी दबाव में अन्तरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की बैठक में दो बार ईरान के खिलाफ वोट दिया, सितम्बर 2005 में और फिर फरवरी 2006 में। जब पहली बार भारत के तेहरान के पक्ष में विरोध मत डाला तो ईरानी प्रतिनिधि ने तत्काल घोषणा कर दी भारत-ईरान गैस समझौता रद्द हो गया। अब मान-मनौवल चल रहा है।


विकल्प- बायोगैस-ऊर्जा
चाहे अमरीका से न्यूक्लियर ऊर्जा का समझौता हो, चाहे ईरान से गैस आयात का मसला भारत की स्थिति काफी किरकिरी हो गयी है। भारत की सरकार को इन पचड़ों से, खासतौर से न्यूक्लियर समझौते बचना चाहिए। भारत के अन्दर ही ऊर्जा के अकूत भंडार हैं, उनक लिए नयी दृष्टि और नई पहल की जरूरत है।


भारत में कोई 41 करोड़ पशु हैं। उनके गोबर से जगह-जगह गोबर गैस प्लांट लगाये जाँये तो देश को जितनी ऊर्जा की जरूरत है, वह पूरी हो जायेगी; फिर न पेट्रोल आयात करने की जरूरत होगी और न गैस और न न्यूक्लियर ऊर्जा की जलालत में फँसना होगा। इसके लिए तीन काम करने होंगे:


(1) अच्छे वैज्ञानिकों की टीम इस पर शोध करे, इसकी अच्छी टैक्नोलोजी विकसित करें। दरअसल अच्छे वैज्ञानिक इसमें दिमागी गुलामी की वजह से हाथ नहीं डालते। गोबर गैस मे कुछ अच्छा काम कर भी लिये तो 'गोबर साइंटिस्ट' कहलायेंगे।

(2) सरकार को इस योजना में अच्छी खासी पूंजी लगानी चाहिए जिससे गाँव-गाँव में बढ़िया गोबर गैस प्लांट बनाये जायें। इसके लिए पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाया जाये जिससे गैस से बिजली बन सके।

(3) प्रशिक्षण व्यवस्था: गोबर गैस प्लांट के लिए जिले स्तर पर लोग प्रशिक्षित किये जायें। गोबर गैस प्लांटों की सर्विसिंग-मरम्मत के लिए प्रशिक्षित लोग रख जायें।


सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा
बरसात के कुछ दिनों को छोड़कर भारत में सूर्य की रोशनी हमेशा मिलती है। सौर ऊर्जा की टैक्नोलोजी विकसित हो गयी है, उस पर और अच्छी शोध कराया जाय और जगह-जगह पर सौर्य प्लांट लगाये जाय। इस कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर एक मिशन के रूप में किया जाना चाहिए इसके लिए सरकार खर्च करे। इसमें लोग भी पहल कर सकते हैं।(पीएनएन)

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