बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद -डॉ. बनवारी लाल शर्मा

(देश में गहरा आक्रोश है। जरूरत इस बात की है कि यह आक्रोश क्रांतिकारी परिस्थितियों के निर्माण की दिशा में बढ़े। ऐसे में आत्मविश्वास के साथ पश्चिमी चुनौती को स्वीकार कर आजादी की नई लड़ाई में कूदने का वक्त आ गया है।)

भारत में अंग्रेजियत की नींव डालने वाले लार्ड मैकाले ने एक बार भारतीयों के बारे में कहा था, 'केवल अपने नाक-नक्शे में ही वे देशी हैं, अन्यथा अपने अंदाजों में, मस्तिष्क की आदतों में और यहां तक कि शुध्द मनोवेगों में भी वे यूरोपीय होंगे।' मैकाले को विश्वास था कि भारतीय मानस को जड़ से प्रभावित करने के लिए उसने जिस शिक्षा प्रणाली की नींव डाली थी, वह जरूर उसकी भविष्यवाणी को सिध्द करेगी। हमारे देश के नीति-निर्माताओं को अफसोस है कि मैकाले की बात पूरी खरी क्यों नहीं उतर रही है। तभी तो राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने बड़े अफसोस के साथ कहा कि दो सौ साल अंग्रेज इस देश में रह गए और केवल दो फीसदी ही देशी लोग अंग्रेजी जानते हैं। इस गलती को दूर करने के लिए राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने संस्तुति की है कि देश के बच्चों को पहली कक्षा से लेकर बारहवीं कक्षा तक अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढ़ाई जानी चाहिए। आयोग तो पहल कर ही रहा है, शिक्षा का धन्धा करने वाले गांव-गांव में 'इंग्लिश मीडियम' के 'पब्लिक स्कूल' खोल रहे हैं, जिनमें पिचके गाल वाले कुपोषित बच्चे भी टाई बांधे 'ए' से 'एप्पल' रटते दिखते हैं।

उपनिवेशकाल में भारत के पढ़े-लिखे लोगों में यूरोप-केन्द्रित दृष्टि इतनी जम गयी कि आज भी वह वर्ग उसको दुहराने और उसका उपकार जताने में किसी प्रकार की हया-शर्म महसूस नहीं करता। सितम्बर 1996 में भी पी. चिदम्बरम आज की तरह भारत सरकार के वित्तामंत्री थे और अपनी उदारीकरण की नीतियों के कारण पश्चिम की दुनिया के दुलारे थे। वे वाशिंगटन में व्यवसायियों के एक सम्मेलन को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने अमरीकी उद्यमियों से कहा था, 'आप में से उन लोगों से, जो भारत आना चाहते हैं, मुझे यह कहना है कि आप लम्बे समय के लिए वहां आइए। पिछली बार आप भारत पर एक दृष्टि डालने के लिए आए थे। आप दो सौ साल ठहरे। इसलिए इस बार, अगर आप आएं तो और दो सौ साल रहने के लिए तैयारी करके आएं। वहीं सबसे बड़े प्रतिफल हैं।'

वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तो दो कदम आगे बढ़ गये। 8 जुलाई 2005 को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि ग्रहण करने पर व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा था, 'आज बीते समय को पीछे मुड़कर देखने से जो संतुलन और परिप्रेक्ष्य मिलता है, उससे एक भारतीय प्रधानमंत्री के लिए दावे के साथ कहना संभव है कि भारत का ब्रिटेन के साथ का अनुभव लाभकारी भी था। कानून, संवैधानिक सरकार, स्वतंत्र प्रेस, पेशेवर नागरिक सेवा, आधुनिक विश्वविद्यालय और शोध प्रयोगशालाओं के बारे में हमारी अवधारणाओं ने उस कढ़ाव में स्वरूप ग्रहण किया है, जहां एक युगों पुरानी सभ्यता उस समय के प्रबल साम्राज्य से मिली। ये वे सभी तत्व हैं जिन्हें हम अभी भी मूल्यवान समझते हैं और जिनका आनन्द लेते हैं। हमारी न्यायपालिका, हमारी कानून व्यवस्था, हमारी अफसरशाही और हमारी पुलिस, सभी महान संस्थाएं हैं जो ब्रितानी-भारतीय प्रशासन से निकली हैं और उन्होंने देश की अच्छी सेवा की है। ब्रिटिश राज की सभी धरोहरों में अंग्रेजी भाषा और आधुनिक विद्यालय व्यवस्था से ज्यादा महत्वपूर्ण और कोई धरोहर नहीं।'

दरअसल, ये सबसे महत्वपूर्ण धरोहरें, अंग्रेजी भाषा और विद्यालय व्यवस्था ही हैं, जो पश्चिम केन्द्रित दृष्टि को केवल टिकाए ही नहीं रही हैं, बल्कि उसे आजादी के इन साठ सालों में आगे भी बढ़ाया है। उपनिवेश काल में स्थापित हुई शिक्षण संस्थाओं की तर्ज पर बनी शिक्षण संस्थाएं पश्चिम के मूल्यों को बढ़ा रही हैं और उनमें प्रशिक्षित बुध्दिजीवियों द्वारा प्रतिपादित सिध्दान्तों और व्यवस्थाओं का वफादारी के साथ अनुसरण्ा भी कर रही हैं। 'कृषि, शोध, शिक्षण और प्रशिक्षण में भारत-अमरीकी ज्ञान पहल' (इंडो-यूएस नॉलेज इनीशिएटिव ऑन एग्रीकल्चर रिसर्च, एजूकेशन एण्ड ट्रेनिंग) इस मानसिकता का ताजा उदाहरण है। भारत में कृषि पर शोध-अध्ययन की नीतियां यह 'ज्ञान-पहल' बना रहा है जिसमें सात सदस्य भारतीय और सात अमरीकी हैं। अमरीकी सदस्यों में प्रमुख सदस्य अमरीकी बीज कम्पनी मोनसेंटो और खुदरा बाजार की सबसे बड़ी कम्पनी वाल-मार्ट के उच्च अधिकारी हैं। अन्न की बड़ी अमरीकी सौदागर कम्पनी एडीएम (आर्थर-डेनियल-मिडलेंड) भी शामिल है। यह समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि भारत की खेती की दिशा क्या होगी। एक के बाद एक सरकारें जो कृषि नीतियां घोषित कर रही हैं, उनके अदृश्य लेखकों के नाम कहीं खोजने की जरूरत नहीं है।

यह प्रक्रिया यहीं रुक नहीं रही है। वाणिज्य मंत्रालय की पहल पर मानव संसाधन मंत्रालय ने एक बिल तैयार किया है जिसे कैबिनेट की मंजूरी मिल गयी है। इस बिल के पास हो जाने पर विदेशी विश्व विद्यालयों और उच्च शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थाओं को भारत में अपने कैम्पस खड़े करने की इजाजत मिल जाएगी। ये संस्थाएं भारतीय मानस को और भी पश्चिम केन्द्रित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

दरअसल, आजादी के इन साठ सालों में क्रमिक रूप में अंग्रेजों के राज्य-उपनिवेशवाद के उत्ताराधिकारी के रूप में 'बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद' (कारपोरेट कॉलोनियलिज्म) कायम हुआ है। अंग्रेजों के बाबुओं की उत्ताराधिकारी, अब 'साइबर बाबुओं' की एक बड़ी जमात बड़े-बड़े नगरों में दिखाई पड़ती है, जो 'निशाचर' बनकर पूरी रात अमरीकी और यूरोपीय कंपनियों के लिए चन्द टुकड़ों पर खटती-मरती रहती है और जिसकी अच्छी-खासी ऊर्जा अमरीकी लहजे में बात करना सीखने में खर्च होती है। भाषा, भेष और भोजन सभी में वे गलती से भारत भूमि में पैदा हुए अमरीकी-यूरोपीय लगते हैं।

समाज का एक वर्ग होता है जो उपनिवेश काल में फूलता-फलता है। यह वह वर्ग है जो उपनिवेशी ताकतों के सामने आत्मसमर्पण कर देता है और उपनिवेशी ताकतों की लूट का एक अंश मदद के बदले में पा लेता है। कारपोरेटी उपनिवेश काल के वर्तमान दौर में इस वर्ग ने तरक्की की है और इस तरक्की के कुछ मानक गिना दिए जाते हैं।

देश में उन्नति के अन्य मानक भी राजनेता और अर्थशास्त्री गिना देते हैं। निवर्तमान राष्ट्रपति ने तो भारत को महान देश होने की एक तारीख 2020 तय कर दी है, पर इस तरक्की की चमकीली परत को जरा सा नाखून से खुरचने पर देश की असली तस्वीर उभर आती है। विश्व का इतिहास गवाह है कि उपनिवेशवाद पूंजीवाद के विस्तार के लिए खड़ा हुआ और हो रहा है और यह पूंजीवाद क्रूरतम हिंसा और वीभत्स शोषण पर खड़ा हुआ है। आज देश में संविधान को धता बताते हुए पूंजीवादी व्यवस्था बड़ी तेजी से स्थापित की जा रही है। सरकार की भूमिका मात्र फेसीलीटेटर की रह गई है। देश देशी-विदेशी पूंजीपतियों को सौंप दिया गया है। आमजन कहीं पूंजीपतियों के इरादों में अड़ंगा लगाते दिखते हैं, तो सरकारें उन पर गोली चलाकर अपना कर्तव्य पूरा करती हैं, जैसा कि पूरी दुनिया ने पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में हाल ही के दिनों में देखा। देश में सभी नीतियां- देशी विदेशी कारपोरेट घरानों के इशारों पर बन रही हैं। यह अब जगजाहिर है कि अमरीका के साथ भारत के न्यूक्लियर समझौते में जनरल इलेक्ट्रिक (जी ई) जैसी अनेक कंपनियों ने बड़ी मात्रा में धन खर्च करके लाबिंग की थी। विशेष आर्थिक क्षेत्रों-सेज को विदेशी इलाके (फॉरेन टैरीटरी) घोषित करके उपनिवेश कायम करने की चल रही प्रक्रिया पर सरकार ने अपनी मुहर लगा ही दी है।

यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना विजय-कूच करने में जिन संस्थाओं से हवाई संरक्षण (एअर कवर) लेती हैं, उनमें प्रमुख हैं-विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ)। पहली दो संस्थाएं कर्ज के हथियार का, और तीसरी व्यापार के हथियार का इस्तेमाल करके भारत को तृतीय विश्व (व्यापार) युध्द में परास्त कर चुकी हैं और विधिवत 'बाजार' को विजयी घोषित कर दिया गया है।

परास्त देश के जो लक्षण होते हैं, वे देश में दिख रहे हैं, भले ही मीडिया का ढोल पीटकर और चकाचौंध दिखाकर उससे दृष्टि हटाने की कोशिश हो रही है। कौन नहीं जानता है कि इस देश में पिछले कुछ सालों में कोई सवा लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यह सिलसिला थम नहीं रहा है। बेरोजगारी का तो यह आलम है कि चन्द पदों के लिए लाखों युवक-युवतियों की भीड़ पुलिस की लाठी खाने को जमा हो जाती है। गैर-बराबरी का तो आलम यह है कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में मलिन बस्तियों में रहने वालों की आबादी साठ फीसदी है और देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में मलिन बस्तियों से ज्यादा जगह कारें घेरती हैं। कुपोषण का यह हाल है कि देश के कोई आधे बच्चे 5 साल से ज्यादा जीवित नहीं रह पाते। हिंसा, असुरक्षा का यह आलम हे कि देश में 5 साल से लेकर 70 साल तक की महिला अपने को यौन शोषण से सुरक्षित महसूस नहीं करती। गोलीबारी, हत्या, लूटपाट, आतंकवाद तो भारतीय जीवन का अंग ही बन गए हैं।

देश में इन सबके कारण आक्रोश है। चिन्ता की बात यह है कि यह आक्रोश गृह-युध्द की दिशा में न बढ़ जाए, जिसके लक्षण कुछ-कुछ दिख रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि यह आक्रोश देश में क्रान्तिकारी परिस्थितियों के निर्माण की दिशा में बढ़े। देश के युवा चमक-दमक के पीछे छिपी बहुराष्ट्रीय गुलामी को समझें। आत्मविश्वास के साथ इस पश्चिमी आक्रमण की चुनौती को स्वीकार करें और आजादी की नयी लड़ाई में कूदें।

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