गाँवों में जबरन घुसता बाजार और पंचायत में महिलाएँ - लोकेन्द्रसिंह कोट

मैं मिट्टी में खेला, मिट्टी में ही बना हूँ। गाँव में जन्मा, बचपन का बड़ा हिस्सा वहीं बीता, किशोरावस्था की भी बड़ी कशिश की दुपहरी और ऍंधेरी-उजाली रात गाँव में ही बीती। अब फिर गाँव में हूँ, फेलोशिप की वजह से। इस थोडे से अंतराल में गाँव में बडे-बडे क़्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, शक्ति के नए समीकरण बने हैं। त्रिस्तरीय पंचायती राज आ गया है। महिलाएँ भी नेतृत्व करने लगी हैं। होले-होले शहर की सभी न्यामतें यहाँ पहुंच गयीं हैं। शहरी आदतें धीरे से अपनी पैठ जमा रहीं हैं। देर तक जगना, देर से सोना, शोर-शराबे में एकान्त क्षण पाना। अब देखता हँ बच्चे रेड़ियों, टीवी, टेपरिकॉर्डर के मतवाले हैं और उन्हे पूरे वाल्यूम पर चला देते हैं, तभी उनके पढ़ने में एकाग्रता बनती है।
गोंड़ और बैगा आदिवासी बहुल मंड़ला और बालाघाट जिले की यात्रा के दौरान महिलाओं को शासन करते और उन्हे समाज द्वारा अपनाते हुए देखना उतना ही अच्छा लग रहा था जितना की किसी अच्छे बदलाव के होने पर लगता है। लेकिन लगभग पूरी तरह से बदलते गाँव में स्मृतियों में बसा पुराना गाँव और उसकी अमराई आज भी बुलाते प्रतीत होते रहे। वह खुला ऑंगन बुलाता रहा जहाँ कूटे गए धान की महक में, कूटने वाली चूड़ियों की खनक में और उसके भरे-पूरे होने की लहक में रोम-रोम खिल उठता था। वह बड़े से बरगद की छाँव बुलाती रही जहाँ जेठ की दुपहरी कबड्डी को और सावन की दुपहरी झूलों के मध्य खिलखिलाती ग्रामीण नवयौवनाओं को अर्पित होती थी। दूर उस पीपल की छांव में बच्चे दिन-दिन भर ढेरों तरह के खेल खेला करते थे और झगड़ते रहते थे अपने-अपने दाव के लिए। गाँव से थोड़ी ही दूर पर बारहमास बहने वाली नालेनुमा नदी जो पनघट के साथ-साथ सांस्कृतिक केन्द्र भी थी, वह बुलाती रही। पहले जब संध्या होती थी तब गांव के हर ऑंगन में उस छोटे से तुलसी के बिरवे के नीचे छोटा-सा दिया जलता था तो अनायास ही हाथ प्रार्थना की मुद्रा में जुड़ जाते थे, क्योंकि उस दिए में लौ मिली हुई थी संयुक्त परिवार की, माँ की, बहन की, भाभी की, पत्नी की, बहू की, बेटी की, रोटी की, भात की, नए गुड़ की ....।
अब यही गाँव शहरनुमा तर्ज पर बदल रहे हैं। उनका अपनी मौलिकता और ठेठपन गायब नजर आता है। मंड़ला जिले में स्थित विश्वप्रसिध्द कान्हा-किसली नेशनल पार्क से लगे हुई खटिया ग्राम पंचायत को ही लीजिए, बैगा और गोंड़ आदिवासी क्षेत्र इन दिनों विभिन्न लुभावने रिसोर्टों से अटा पड़ा है। सरपंच सुखवती बाई बताती हैं कि क्षेत्र में पानी की समस्या है और खेती के लिए भी पर्याप्त जल स्रोत नहीं हैं। दूसरी और हम देखते हैं कि वहाँ आपको बहुराष्ट्रीय कंपनियों के तमाम तरह के शीतल पेय पग-पग पर मिल जावेंगे और रिसोर्टों के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो जाता है। बाजार के दखल ने आदिवासियों को हाशिए पर धकेलना प्रारंभ कर दिया है।
खटिया पंचायत के सचिव बालकुमार यादव जिनके हाथ में ब्लूट्रूथ, केमरा युक्त अत्याधुनिकतम मोबाईल फोन है, 25-30 मिनिट की बातचीत के दौरान वे कई बार बतियाते भी हैं, और एक कुशल प्रबंधक की तरह से कहते हैं कि हमने आदिवासियों की लोककला को पर्यटकों के लिए एक समूह के माध्यम से खोल दिया है। पंचायत में ऑपरेशन थिएटर एवं सुविधा सम्पन्न प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भी है लेकिन अभी भी वहाँ प्रसवोपरांत मृत्यु दर्ज हो रही है। दूसरी बार सरपंच बनी सुखवती बाई जो स्वयं भी गोंड़ हैं, कई मुद्दों पर अनभिज्ञ हैं और सचिव को ही आगे ठेलती दिखती हैं। उनके आरसीसी के निर्माणाधीन घर में भी रंगीन टीवी, डीवीडी प्लेयर आदि उपलब्ध है।
मोबाईल हाथ में लिए 38 गांवों की जनपद की जनपद सदस्य मंडला जिले के मोगा ब्लॉक की और गोंड़ आदिवासी सोनाबाई उइके भी गांवों से शहरों की ओर होने वाले प्रव्रजन से चिंतित हैं। उनके स्वयं के गांव पलिया के आसपास पर्यटन विभाग की वृहद परियोजना 'चौगान' को व्यवहारिक रूप देने की चल रही है। पास ही बहती जीवनदायनी नर्मदा की टूटती धाराएँ और बहुत कम होता पानी भी अत्यधिक दोहन की ओर इशारा करता है।
मंडला और बालाघाट जिलों के अन्य गांवों को भी देखने के बाद उनमें बाजार की घुसपैठ का अंदाजा लगाया जा सकता है। एक दूरस्थ गांव भानपुर खैड़ा के आदिवासियों की भी सामाजिक-आर्थिक हालत कमजोर है लेकिन एक सात-आठ साल के बच्चे को विभिन्न कंपनियों के 'गुटके' बेचते हुए देखकर स्थितियाँ और भी साफ हो जाती हैं। इसी गांव के लोगों से बातचीत करने पर पता चलता है कि किसी कथित प्रायवेट बैंक की एक ऐजेंट यहाँ से हजारों रूपए पक्के मकान बनवाने के नाम पर झांसा देकर भाग चुकी है।
बालाघाट जिले की हट्टा ग्राम पंचायत का दौरा करने के बाद तो लगता है कि पूरे कुँए में ही भांग घुली है। तमाम ईंट के भट्टों के ठेकेदारों ने पंचायत के विकास के समीकरण बदल से दिए हैं। इन आदिवासी पंचायतों में भी सारे शहरी तौर-तरीके, भागम-भाग, पैंतरे आ गए हैं। इसी क्षेत्र में कार्य करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता विवेक पवार कहते हैं कि हम आदिवासियों का विकास चाहते हैं, अभी तक गांधीवादी दृष्टिकोण से चलने वाले इन आदिवासियों के लिए विकास की कौनसी परिभाषा ली जावे ताकि ये विकास की मुख्य धारा में भी आ जावें और इनकी मौलिकता भी बची रहे...... यह प्रश्न अभी भी जस का तस हमारे समक्ष एक चुनौती की भाँति खड़ा है।
इन सबके कारण भी हैं और ठोस कारण हैं। अब हम आदर्शों, संस्कारों, परम्पराओं, भावनाओं, आस्थाओं के जीते नहीं है, वक्त आने पर इन्हे शब्दों की भाँति दोहरा भर लेते हैं या फिर भार की तरह ढ़ो लेते हैं। इस पर ज्यादा कुछ बात करो तो चाँद पर पहुँचने की दुहाई दी जाती है, दकियानूसी होने के आरोप लगाए जाते हैं और फिर से वही दौर प्रारंभ हो जाता है। दूसरा कारण है थोड़ी ही दूर पर उपलब्ध बाजार, जहाँ उपभोक्तावाद मॅुंह फाड़े खड़ा है। जिसके आगे भावनाएँ, इच्छाएँ, मान-मर्यादाएँ सब गौण हैं, महत्वपूर्ण है तो बस रूपया। इसके अलावा लुभावने, मन-भावन भौतिक संसाधन, सुख सुविधाओं की दिखावटी चमक-धमक और एक अजीब से आकर्षण की मृग-तृष्णा, सब कुछ तो है बाजार के पास। ऐसे में गाँव को महज यह कह कर रोकना कि सभी चमकने वाली वस्तु सोना नहीं होती, नक्कार खाने में तूती की आवाज जैसा लगता है। यह आवाज उस चालाक और बधिर बाजार के मायाजाल से टकराकर बोलने वाले के पास प्रतिध्वनि के रूप में पुन: लौट आती है। सब कुछ पा लेने की दौड़, झटपट काम करने की हौड़ और रोज बनते-बिगड़ते रिश्तों की जोड़-तोड़ के माहौल में किसी से यह आशा रखना कि वह हाथी के इन शोदार दातों या नकली चमकते सोने को पहचान ले अपने ज्ञान के जरिए तो यह बेमानी होगा, क्योंकि इतना ज्ञान भी किसके पास है?
औद्योगिकरण और मशीनीकरण के प्रभाव से कथित विकास हुआ, ग्रामीण शहरों की और भागने लगे। येन-केन-प्रकारेण धन कमाने के सारे साधन पूंजीवादी लोगों के कब्जे में आ गए और गांधी का सपना बिखर कर रह गया। ग्रामीण व्यवसाय शहरों की ओर पलायन कर गए और प्रत्येक गाँव की स्थिति वैसी ही हो गई जैसी अंग्रेजों के समय थी। उस समय कच्चा माल विदेश जाता था और उसी से बना माल उच्च कीमत पर बिकने भारत आता था।
मुगफली, तिल, सोयाबीन सस्ते दामों पर शहर जाने लगी और मिलों द्वारा तैयार तेल, खली महँगे दामों पर गाँव में बिकने के लिए आने लगे। गाँव में रहने वाले तेली, खाती, लुहार, कुम्हार, मोची अपने-अपने कार्यों के अभाव में मजदूरी करने शहर जाने लगे। कपास, दूध, दलहन सभी मिल मालिकों के कब्जे में आ गया। दही बिलौने, चरखें आदि के दिन लद गए। अब गाँव की दुकानों पर फलां छाप नमक, फलां छाप तेल, फलां साबुन-टूथपेस्ट आदि बिकने लगे। मशीनीकरण की वजह से कृपि के यंत्र बुवाई, सिंचाई, बीज, खाद आदि शहरों में केन्द्रित हो गए और सारी खेती शहरी उपकरणों की गुलाम हो गई। जमीन भी विपरीत परिस्थितियोंवश टुकडे-टुकड़े में बँट गई और कई लोग उन्हे बेच-बेचकर शहर में रोजगार की तलाश में निकल गए। खेत जुताई के लिए ट््रेक्टर, बीज, खाद के लिए बड़ी कंपनियों के माल का सहारा, सिंचाई के लिए बड़ी कंपनियों के ही इंजन या विद्युत पंप। कुल मिलाकर खेती वही कर सकता है जिसके पास नकद पैसा हो, नहीं तो उधारी और तगडा ब्याज भरो इसके अलावा कोई चारा नहीं।
पहले सारा परिवार खेती में लगा रहता था, खेती में इतना पैसा खर्च नहीं होता था, केवल कामगारों को फसल पर अनाज देना होता था, अब स्थिति यह है कि कमाई का आधे से अधिक भाग उन्ही पूंजीवादी संस्थानों को जा रहा है। इसतरह यह फिर से जमींदारी प्रथा का ही नयारूप जन्म ले रहा है। जहाँ खेती की पैदावार से बगैर मेहनत के बिचौलिए ही वारे-न्यारे हो जाते हैं वही उन्हीं किसानों का माल चमकीली थैलियों, डिब्बाबंद प्रदार्थों के रूप में पुन: उन्ही के पास अधिक दामों में आता है। गाँवों का यह ढांचा बिगड़ने से कई लोग 'फ्री' हो गए हैं। या तो ये लोग शहरों की और पलायन कर रहे हैं या फिर वहीं गाँव में राजनीति, प्रपंच, झगडे अादि में व्यस्त रहते हैं।
यह एक विडंबना ही है कि गाँव के लोग मजदूरी करने शहर जाते हैं और अपने बीबी-बच्चों को जो गाँव में रह रहे हैं, उन्हे भेजी गई पगार से जीवन यापन करना पड़ता है। शहर के संकुचित माहौल में जाकर ये ग्रामीण्ा अधिक से अधिक पैसा कमाने के चक्कर में अपना स्वास्थ्य खराब कर बैठते हैं। ग्रामीण उद्योग धंधों के नष्ट हो जाने के कारण खाट, बांण, मटके, लकड़ी व अन्य लोहे के सामान भी शहरों में उसी प्रकार से आने लगा है जैसा कि पचास साल पहले पैसिंल, सुई, गर्डर, मशीने लंकाशायर और लंदन से हमारे यहाँ आती थी।
आइये जरा ऑंकड़ों की जुबान से गाँवों को निहारें तो शहरों की भँाति गाँवों में भी हरित क्रंाति के बाद एक नव-धनाड़य वर्ग ने जन्म लिया है। चॅूंकि भारत में ग्रामीण जनता का प्रतिशत ज्यादा है इसलिए उदारीकरण के बाद विदेशी कंपनियाँ अपने उपभोक्ताओं को वहीं गाँव में पकड़ रही हैं। ग्रामीण उपभोक्ता की नब्ज दबाकर ये कंपनियाँ उनके हिसाब से अपने उत्पादों में बदलाव लाकर बेच रही है। पिछले साठ सालों की आजादी के बाद हमने उन्नति के नए-नए इतिहास रचे हैं, परंतु यदि मूल में जाकर देखें तो अंग्रेजों के समय का औपनिवेशिक दृष्टिकोण आज भी हमारे विचारों की गहराई में मिल जाएगा। यह आजादी 25 प्रतिशत लोगों को लाभकारी हुई है जबकि 75 प्रतिशत लोगों के लिए थोड़ी सी स्वतंत्रता के साथ वही अग्रेजी शासन की पुनरावृत्ति भर है। राष्ट््रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपने समय जिस तरह के गाँव की कल्पना की थी वह अब केवल स्वप्न रह गया है।

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