विकलांगता : अधिकारों को लंगड़ा बनाती

(राजीव रतूड़ी लिखते हैं कि मानव अधिकारों की संयुक्त राष्ट्र घोषणा से शुरू होने वाली विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों की छ: दशक पुरानी लड़ाई इस घोषणा और बाद में हुए तमाम अंतर्राष्ट्रीय कन्वेन्शनों के फलस्वरूप देश में बने कानूनों के लागू न हो पाने के कारण अभी खत्म नहीं हुई है।)
भारत में फैले 700 लाख विकलांग व्यक्तियों के साथ आज भी दूसरे दर्जे के नागरिक का बर्ताव किया जाता है। उनके लिये अलगाव, सीमांतीकरण और भेदभाव आज भी अपवाद नहीं बल्कि आम है। प्रचलित रुख के कारण खड़ी हुई रूकावटों से रूबरू विकलांग आज भी दया और कल्याण के पात्र समझे जाते हैं और विश्व उनके सबसे बुनियादी अधिकारों को कुचलता हुआ आगे बढ़ जाता है। 1948 में मानव अधिकारों की संयुक्त राष्ट्र घोषणा, जो न्याय, स्वतंत्रता और शांति सुनिश्चित करने के लिये मानव अधिकारों के पालन को जरूरी पूर्व शर्त मानती है, हो जाने के बावजूद ऐसा हो रहा है।
1992 में, भारत ने एशिया और प्रशांत क्षेत्र में विकलांग व्यक्तियों के लिये समानता और पूर्ण भागीदारी की घोषणा पर हस्ताक्षर किये। यह घोषणा पीकिंग में आयोजित एशिया और प्रशांत क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक आयोग के सम्मेलन में अंगीकार की गयी थी। इस घोषणा ने सदस्य देशों पर अपनी प्रतिबध्दताओं के अनुसार कानून बनाने की जिम्मेदारी डाल दी और उसी के अनुसार संसद से विकलांगतायुक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों की सुरक्षा और पूर्ण भागीदारी) कानून 1995 पारित हुआ।
विकलांगता से ंसबंधित चार घरेलू कानूनों में यह कानून ऐसा है जो विकलांगतायुक्त व्यक्तियों के अधिकारों के सम्मान की बात करता है और सरकार के ऊपर उनकी पूर्ण भागीदारी के लिये सहूलियतें उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी डालता है। कानून के सभी प्रावधान सशक्तीकरण करने वाले हैं, परंतु दुर्भाग्य से, यद्यपि यह कानून लगभग एक दशक पहले पारित हो चुका है, इसका कार्यान्वयन चिंताजनक रूप से नाकाफी है। वे जो इसे लागू करने के लिये जिम्मेदार है और वे जो विकलांगता से ग्रसित हैं बहुधा इस कानून के प्रावधानों से अनजान रहते हैं।
यह कानून सात किस्म की विकलांगताओं को मान्यता देता है परंतु विभिन्न अधिकारों और एंटाइटलमेंट्स के प्रावधानों को केवल दृष्टि सम्बन्धी, सुनने और हड्डियो की विकलांगता, इसमें सेरेब्रल पाल्सी भी शामिल है, तक सीमित कर दिया गया है। यद्यपि आटिज्म और बहरापन जैसी विकलांगताओं को विकलांगता की सूची में शामिल नहीं किया गया है परंतु इस कानून के सामान्य लाभ सभी किस्म के विकलांग समूहों के लिये है।
विकलांग लोगों द्वारा अपने अधिकारों के एंटाइटिलमेंट का दावा करने में सबसे बड़ी रूकावट उनकी विकलांगता के प्रमाणीकरण का मुद्दा है। प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों के पास ऐसे विशेषज्ञ और जरूरी उपकरण्ा उपलब्ध नहीं होते जो विकलांगता के प्रमाणीकरण के लिये जरूरी है। परिणामस्वरूप बीईआरए परीक्षण सुविधाओं के अभाव में स्वैच्छिक परीक्षण प्रक्रिया द्वारा ही प्रमाणीकृत श्रवण विकलांगता के व्यक्ति आपको मिल जायेंगे। ऐसे व्यक्ति भी मिल जायेंगे जो प्रमाणीकरण के लिये एक डाक्टर से दूसरे डाक्टर तक दौड़ते रहते हैं। मानसिक विकलांगों के प्रमाणीकरण के लिये कोई स्तरीय प्रक्रिया मौजूद नहीं मिलेगी क्योंकि अस्पतालों में मानसिक चिकित्सक और मनोवैज्ञानिक नहीं हैं। प्रमाणीकरण प्रक्रिया को सरल करने और विकलांगता प्रमाणपत्र जारी करने की एकल खिड़की व्यवस्था बनाने की तत्काल आवश्यकता है।
यह कानून लिंग तथस्थ है। विकलांगों के मानव अधिकारों की रोशनी में विकलांगतायुक्त व्यक्ति कानून (पीडब्लूडी एक्ट) के तहत विकलांगों को मिले अधिकारों की समीक्षा की आवश्यकता है। हालांकि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक अधिकारों को तो इस कानून के अंतर्गत एक सीमा तक मान्यता मिली है, सांस्कृतिक अधिकारों के बारे में इसमें नहीं सोचा गया है। प्रत्येक विकलांग व्यक्ति सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी करने, खेल और मनोरंजन गतिविधियों में शामिल होनें और मीडिया तथा प्रसार तक पहुंच बनाने के लिये अधिकृत है।
नागरिक और राजनीतिक अधिकार भी विकलांगतायुक्त व्यक्ति कानून (पीडब्लूडी एक्ट) के दायरे में नहीं लाये गये हैं। विकलांगता वाले सभी व्यक्तियों को अधिकार है कि उनकी कानून तक समान पहुंच हो, अमानवीय और निर्दयी व्यवहार से मुक्ति हो, संगठन बनाने की स्वतंत्रता हो, बोलने की आजादी और सूचनाओं तक पहुंच हो, शादी करने और परिवार बसाने का अधिकार हो और राजनीतिक तथा सार्वजनिक कार्यों में भाग लेने की स्वतंत्रता हो।
विकलांग व्यक्तियों के राजनीतिक और नागरिक अधिकारों का बहुधा हनन होता है। उन्हीं के लिये बनाये गये संस्थानों में उनके साथ निर्दयतापूर्ण और अमानवीय व्यवहार होता है। बहरे व्यक्तियों के चूंकि भाषागत अधिकारों को मान्यता नहीं दी गयी है और जिस भाषा को वे समझते हैं उस भाषा में उन्हें जानकारियां मुहैया नहीं करायी गयी हैं, लिहाजा उनको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार नहीं मिल पाता। यहां तक कि कई बार तो उन्हें विवाह करने और घर बसाने का अधिकार भी नहीं दिया जाता क्योंकि ऐसा मान लिया जाता है कि गंभीर विकलांगता वाला व्यक्ति विवाह करने और घर बसाने में अक्षम है। अक्सर ऐसी महिला से उसके बच्चे को भी अलग कर दिया जाता है जो दोषपूर्ण मानसिकता की होती है और ऐसी मानसिकता के व्यक्ति को राजनीतिक पद प्राप्त करने और वोट डालने तक का अधिकार नहीं दिया गया है।
इस कानून के कई अभिवन्दनीय प्रावधानों के पहले 'अपनी आर्थिक क्षमताओं की सीमाओं के अंदर' जैसे शब्द जोड़ दिये गये हैं। क्या सरकार इन शब्दों को कुछ भी न करने का बहाना बना सकती है ? पीडब्लूडी एक्ट को प्रभाव में आये 12 वर्ष बीत चुके हैं और इन वर्षों में विकलांग व्यक्तियों को ट्रांसपोर्ट, रोड और निर्मित पर्यावरण में रूकावट मुक्त स्थान उपलब्ध कराने के लिए किसी प्रकार के बजटीय प्रावधान नहीं किये जा सके हैं। यह भी निहायत जरूरी है कि शिकायत निवारण प्रावधानों को और मजबूत किया जाय। यह देखा गया है कि मुख्य आयुक्त-विकलांगता के आदेशों का भी पालन बहुधा नहीं होता है और उनके आदेशों को लागू कराने के लिये उच्च न्यायालयों की शरण में जाना पड़ता है। इस आयोग को उसी तरह की शक्तियां प्रदान करने की आवश्यकता है जो शक्तियां अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग को और महिला आयोग को मिली हुई है। कानून के प्रावधानों की उलंघनीयता की स्थिति में सजा का प्रावधान होना बहुत ही जरूरी है।
मार्च 2007 में अंतिम स्वरूप में आया, विकलांगता युक्त व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (यूएनसीआरपीडी) एक अंतर्राष्ट्रीय संधि है जिसका लक्ष्य वैश्विक स्तर पर विकलांग व्यक्तियों के सम्मान और अधिकार की हिफाजत करना है। 21वीं शताब्दी की पहली मानव अधिकार कन्वेंशन होने के नाते यूएनसीआरपीडी विकलांग व्यक्तियों के प्रति बदलती सोच और रूख को दर्शाता है।
2 अक्टूबर 2007 को भारत इस कन्वेंशन को स्वीकार करने वाला छठा देश बन गया है और जब 20वाँ देश द्वारा यह स्वीकृत होगी तब भारत को अपने कानून तदनुसार बदलने होंगे जिससे वे कन्वेंशन के प्रावधानों से मेल खा सके। इसके बाद भारत में विकलांग व्यक्तियों के मानव अधिकारों की रक्षा करने वाले प्रावधानों को लागू करने का सच्चा संघर्ष शुरू होगा।
इस पृष्ठभूमि में काम्बैट लॉ का विकलांगता को समर्पित यह विशेष अंक ह्यूमन राइट्स ला नेटवर्क के सहयोग से निकालने का सोचा जा रहा है।
(ह्यूमन राइट लॉ नेटवर्क विकलांगता पर कार्य करता है और सभी विकलांगता समूहों को आवाज उठाने के लिये प्लेटफार्म उपलब्ध कराता है और काम्बैट ला के विशेष अंक के साथ इस प्रयास का एक हिस्सा है। हमने सभी समूहों को उचित प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है जिससे वे अपनी चिंता के विषय उठा सके जैसा कि आने वाले लेखों में प्रतिबिंबित होता है। इस लेख के लेखक डिस्एबिलिटी राइट्स इनीशियेटिव ह्यूमन राइट ला नेटवर्क नई दिल्ली के नेशनल डायरेक्टर हैं।)

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